Friday, March 25, 2011

बाबूजी

ज़िन्दगी की कुछ सच्चाई कभी बदल नहीं सकती! ये हम सब जानते हैं, लेकिन उन् सच्चाइयों को स्वीकार करना शायद इतना आसन नहीं होता!


जाते जाते, मुझसे आपने एक बात कही थी,
कहा था आपने मैं लौट के आऊंगा एक दिन,
और फिर खेल खिलोने लेके आऊंगा एक दिन,
आप जब साथ थे तो कितना सब अच्छा था,
माँ भी खुश थी और सारा जग सच्चा था,
कितनी रातों को आप जागे थे हमारे लिए,
कितने ही साल छोड़ आए थे आप हमारे लिए,
गुज़रे दिन और गुज़र गयीं शामें भी,
अब तो लगता है जैसे गुज़र गयीं सदियाँ ही,
आपकी याद हमें चैन से जीने नहीं देती,
दीदी बन बैठी है भाई, देख के पीर पराई,
अपने जीवन को अब तक वो भूल चुकी है,
खुशियों से जैसे सारे नाते वो तोड़ चुकी है,
आपका चेहरा अब भी याद आता है हमें,
आज भी पिछले पहर खूब रुलाता है हमें,
न गुडिया और न खिलोनो की अब चाहत ही बची है,
सूनी आँखों में बस आपकी तस्वीर थमी है,
काश एक बार फिर से आप बाबूजी आ जाएं,
सूने घर को हमारे आप फिर से रोशन कर जाएं,

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