Monday, March 28, 2011

तेरे सामने

खुद की ख़ुशी तो सोची नहीं तेरे सामने,
तुझको खुदा ही समझा, उस रब के सामने,
मेरी वफ़ा का सिला तूने इस तरह दिया,
तू छोड़ चला मुझको मेरे मेरे घर के सामने,
जब याद में मैंने कभी कोई ख़त लिखे,
तूने टूकड़े उसके किये मेरे ही सामने,
मुझको सजा मिली है ये इश्क की जनाब,
मेरे खुदा के ज़ुल्म का कोई नहीं हिसाब,
दिल दर्द और अब तो सह नहीं सकता,
तेरे इश्क के साथ और रह नहीं सकता,
मुझे बक्श दे मेरे खुदा तू और कुछ न कर,
ज़ख्मों को छेड़ कर नासूर अब न कर,
गर हो सके तो मुझको चैन-ओ-करार  दे दे,
एक दिप तू जला दे मेरे जनाज़े के सामने,

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