Thursday, March 24, 2011

यूँही एक बार रास्ते में जब हम तुमसे मिले थे,
कुछ बेबाक सी थी मैं, होश में तुम भी कहाँ थे,
बातों बातों में तुमने वो साज़ छेड दिए थे,
जिनको सुनने की  बेकरारी में मैंने दिन गिने थे,
सामने तुम थे, और नज़रें मेरी नीची थी,
चाँद हाथों में था, क़दमों में ज़मीन फैली थी,
तुमने कुछ पूछा था मुझसे यूँही घबराते हुए,
मैंने भी शायद कुछ कहा यूँही शर्माते हुए,
चलते चलते यूँही रास्ते में एक मोड़ आ गया,
साथ वो चार पल का जाने क्यूँ मुझसे खो गया,
तेरी वो एक झलक दिल में यूँही बसाए हुए,
तनहा बैठे हैं उन्ही यादों को हम सजाये हुए,
बस..... एक और बार तुमसे मुलाक़ात हो जाये,
दरमियाँ अपने जो फासला हैं वो ख़ाक हो जाये,

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