Monday, March 28, 2011

एक और शाम!

एक और शाम तुम मेरे नाम कर दो ना,
मेरे गुनाहों का अब तो हिसाब कर दो ना,
तुम्ही से मैंने ज़िन्दगी को समझा है,
मेरी भी ज़िन्दगी में कुछ और रंग भर दो ना,
इन्ही रंगों में एक रंग तुम मिलाना अपना,
और उसी रंग में मुझे फिर एक बार रंग दो ना!
जो एक पल सुकून का अब तुमसे मिल जाये,
उस एक पल में मेरी खुशियाँ फिर से सिमट जाए,
वो एक और पल सीर्फ मेरे नाम कर दो ना!!
एक और शाम तुम मेरे नाम कर दो ना!

No comments:

Post a Comment