Friday, May 6, 2011

स्पर्श

कोई 16-17 साल की थी मैं, जब तुम्हारा अक्सर आना जाना होता था, छोटे से शहर में, मेरे छोटे से उस घर में! याद है एक बार तुमने यूँही बातों बातों में मुझसे कहा था, के “तुमपे लाल रंग बहुत खिलता है, तुम लाल रंग में मुझे परियों की सी लगती हो”, पूरे एक हफ्ते तक मेरे हर कपड़े का रंग लाल ही होता था! लाल ढीला सलवार और लाल चुस्त कुरता और बालों में लाल परांदा!....मुझे छोटे बाल पसंद थे हमेशा से, पर जाने किसने मुझसे कहा के तुम्हे लड़कियों पे लम्बे बाल पसंद हैं…दिन रात एक कर दी थी मैंने बालों को लम्बा करने  में और जिस दिन ऐसा महसूस किया के अब इतने  लम्बे हो गए हैं के तुम्हे अच्छी लगूंगी,
उस रोज़ मैं खुले बाल लिए तुम्हारे सामने आई इस उम्मीद के साथ के तुम एक बार मेरी ओर देखोगे, और मैं, मैं क्या करुँगी यदि तुमने मुझे देखकर अचानक कुछ कह दिया तो! कहीं  कोई आस पास हुआ, किसी ने कुछ सुना तो!, जब मैं तुम्हारे सामने आई तुम तो मशगूल थे अपने दोस्तों के साथ, तुम्हे तो फुरसत ही नहीं थी  मुझे एक नज़र  देखने की, मैं तो उम्मीदों के आसमान से धीरे धीरे गश्त खाते हुए सच के धरातल पर गिरने ही लगी थी के अचानक........तुमने मेरे बालों को अपनी हाथों में पकड़कर कहा “इन्हें बांध के रखा करो, खुले बालों में तुमको नज़र लग सकती है” तुम्हारा ये कहना था और मैं तो जैसे फिर से आसमान में उड़ने लगी, मुझे तो बस इतना ही याद था के तुमने पहली बार मुझे स्पर्श किया है!
अगले ही दिन तुमने लाल रंग वाली बात कह दी! और तब  से मैंने लाल परांदा बंधना शुरू कर दिया!

मेरे बाल अब तो मेरे घुटनों को छूने लगे हैं, कभी सोचती हूँ इतने सालों बाद मेरे सामने आओगे तो मुझे पहचान भी पाओगे या नहीं! फिर सोचती हूँ के लाल सलवार कमीज़ और लाल परांदे में आउंगी सामने तब तो पहचान
ही जाओगे!


"तेरी ही याद आज भी दिल में बसाये हैं,
हम आज भी उम्मीदों के दिए जलाएं हैं,

एक बार फिर से लौट के जाए तू अगर,
तो पूरा हो मेरे इंतज़ार का सफ़र!"


 

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