Monday, May 16, 2011

यादें भी बच्चों की सी होती हैं!

मेरे घर के सफ़ेद से  चादर पर
कुछ गुज़रे हुए से पल
अटके पड़े हैं, सालों से, जैसे
इन्हें किसी से कोई सरोकार नहीं,
हर सुबह  
यादों की सलवट  
मेरे बिस्तर पर
शोर मचाती हैं,
चीखती हैं, चिल्लाती हैं,
थकती है और चुप हो जाती है…..

यादें भी बच्चों की सी होती हैं!

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