Thursday, June 9, 2011

खो जाते हैं

आओ आज खुद को भुलाते हैं,
कुछ इस कदर एक दुसरे में खो जाते हैं,
तुम मेरी बांह  थामना, मैं तुम्हारे चेहरे को,
तुम उलझे मेरे लट सुलझाना, मैं तुम्हारी उलझनों को
फिर से मिलके कुछ ख्वाब सजाते हैं,
कुछ इस कदर एक दुसरे में खो जाते हैं,
ज़िन्दगी ने तो ग़म ही दिए, और हासिल कुछ न हुआ,
सुबह का नकाब ओढ़े, रात ने बस भुलावा दिया
खुशियों की लहर  एक और बार बहाते हैं,
उलझनों से दूर, दिल की दुनिया बसाते हैं,
आओ आज फिर खुद को भुलाते हैं,
कुछ इस कदर एक दुसरे में खो जाते हैं,


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