Saturday, July 2, 2011

साए


गुज़रे पलों के साए अब भी पुकारते हैं,
तुम हो नहीं कहीं भी, फिर क्यूँ पुकारते हैं,
मुझको यकीं था तुमपे, तुम साथ दोगे मेरा,
कई मुश्किलें भी आयें, पर साथ होगा तेरा
तुमने भी तो कहा था, तू ही है मेरी दुनियां,
गर तूने साथ छोड़ा, ना जी सकूँ अकेला,
फिर एक दिन हुआ क्या, तुमने वो क्यूँ अचानक,
मेरे शहर से जाकर, मुझको वो ख़त लिखा था,
लिखते हुए क्यूँ तुमने एक बार भी ना सोचा,
गुजरेगी क्या जब उसके हाथ ये लगेगी,
मेरे ख्याल जिसके दिन और रात में थे,
मेरे यकीं पे जिसने सपने सजा लिए थे,
वो याद करके मुझको रोएगी, तो क्या होगा,
उसके उन आंसुओं का इल्ज़ाम कैसे लूँगा,
लिखते हुए क्यूँ तुमने एक बार भी ना सोचा,
मैं रह गयी अकेली, कोई नहीं है मेरा,
मेरे अकेलेपन ने, सौ बार मुझको तोडा
गुज़रे पलों के साए अब भी पुकारते हैं,
तुम हो नहीं कहीं भी, फिर क्यूँ पुकारते हैं

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