Thursday, August 4, 2011

ज़ख्मों को ताज़ा कर दिया

आज तुमने वो बात छेड़कर, मेरे ज़ख्मों को  ताज़ा कर दिया!

सबकुछ भुला के, माज़ी को कहीं दूर पीछे छोड़ बहुत आगे  निकल आई थी मैं, (ऐसा मुझे महसूस होता था) पर शायद मैं गलत थी, मैं तो अब भी उसी रास्ते पर चल रही हूँ, उसी मोड़ पर खड़ी हूँ, जहाँ गुज़रे वक़्त के साए मुझे जंजीरों से बांधे हुए हैं, वो एक बेवफाई का बोझ अपने कांधे पे उठाए मैं अब भी चल रही हूँ, बेवफाई….हाँ जो उसने की, और इलज़ाम मेरे सर आया, क्यूँ ….क्यूँ मैंने बर्दाश्त किया वो सब? किसके लिये? अपने लिये? तुम्हारे लिये? या उसके लिये?? क्यूँ किये मैंने वो समझौते जो मैं नहीं करना चाहती थी, जिसको करके आज भी पछता रही हूँ!! क्यूँ बर्दाश्त किया मैंने उसके झूठी शख्सियत को, नफरत करती थी मैं......................... नफरत करती थी मैं उससे कल….और आज भी प्यार नहीं करती! फिर क्या है हमारे बीच??????????….उससे एक रिश्ता जो समाज ने बनाया, और सब ने अपनाया लेकिन मेरे लिये आज भी स्वीकार करना उतना ही मुश्किल है जितना कल था! क्या होगा इस रिश्ते का अंजाम! हर रिश्ता जो शुरू होता है वो एक दिन ख़त्म हो जाता है, क्या ऐसा मेरे साथ भी होगा!

अपने सवालों में उलझी, उनके जवाबों को ढूंढती, चलती जा रही हूँ, एक अकेली सुनसान राह पे, जहाँ कोई नहीं, कोई भी नहीं मेरे साथ, बिलकुल अकेली!! बस एक साया है, हाँ वो एक साया जो मेरे माज़ी ने मुझे सौगात में दी थी!


मेरे तुम्हारे रिश्ते का अब अंजाम क्या  होगा,
आगाज़ ऐसा है तो जाने अंजाम क्या होगा!


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