Thursday, August 4, 2011

रिश्ता

चलो एक ख़ास रिश्ता बनाते हैं,
आओ एक दूसरे में खो जाते हैं,
बेखबर दुनियां से दूर,
कहीं अपना आशियाँ बनाते हैं,
ले चलो मुझे बादलों के पार,
परियों के देस में हम बस जाते हैं
हर सपना सच हो जाए, ये दुआ करते हैं,
खुशियों की खुशबूएं बिखेरकर,
मुस्कुराते, खिलखिलाते, बस यूँही जीते जाते हैं!
चलो एक ख़ास रिश्ता बनाते हैं,
आओ एक दूसरे में खो जाते हैं,

4 comments:

  1. पहली बार आपके ब्लॉग पर आया हूँ , और आपकी नज्मो को अपने भीतर उतारते हुए पाया हूँ , शब्द सिर्फ शब्द नहीं होकर बहुत कुछ कहते है ... क्या कहूँ , रिश्ता ...एक नज़्म ही नहीं ..एक सपना भी है .. बधाई

    आभार
    विजय
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    कृपया मेरी नयी कविता " फूल, चाय और बारिश " को पढकर अपनी बहुमूल्य राय दिजियेंगा . लिंक है : http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/07/blog-post_22.html

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  2. सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति है आपकी.
    कल्पना की खूबसूरत ऊँची उड़ान
    को दर्शाती आपकी अभिव्यक्ति पढकर अच्छी लगी.

    आभार.

    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है.

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