Monday, August 29, 2011

आखिर इनकी उम्र जो निश्चित है!


मेरे तुम्हारे बीच एक रिश्ता...
फिर बना दूसरा रिश्ता
और वो अपनी उम्र निश्चित करके आया था,
बस यूँही.....
बातों बातों में....
दो चार कदम बस साथ चलके...
एक दूसरे का हाथ थाम हाथों में
जाने कितने ख्वाब देख डाले 
जाने कितने धागे बुन डाले,
ख्यालों के सफ़र में तुमको अपने  साथ पाया…कई दफा..
मेरे होठों  को  तुमने  मुस्कान  दिए ..कई दफा…
वो धागे पक्के  हैं, वो खवाब सच्चे हैं…
इसी  एक सोच  के सहारे  गुज़रती  रही  ज़िन्दगी ..
भरोसा  था तुम्हे  खुदपे …मुझे  तुमपे ,
भरोसे  झूठे  थे ………………
सारे  धागे कच्चे  थे,
सारे ख्वाब झूठे थे,
तुमने अपनी मजबूरियां  गिनवाई 
मैंने  अपने रास्ते  बदले ,
पर  इन  रास्तों  पर चलके भी …..
तुम्हारे ही  साथ की  तलाश  रही…
जानती  थी , जानती हूँ  के रिश्तों  को तो  खत्म  होना  ही था,
आखिर  इनकी  उम्र जो  निश्चित है!

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