Thursday, September 1, 2011

आज की रात फिर नींद किसे आएगी

क्या साज़-ए-ज़िन्दगी कभी यूँ भी गुनगुनाएगी, के एक रात तेरी याद तक न आएगी?
शाम से बोझिल हुई इन आँखों में, तेरे चेहरे की धूप आज फिर समाएगी,
आज की रात फिर नींद किसे आएगी! आज की रात फिर नींद किसे आएगी!

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