Saturday, September 10, 2011

चुप्पी

हमारी ना मंजिल एक थी और ना रस्ते, ये तो हम दोनों हमेशा से जानते थे, फिर हमने एक दूसरे से ऐसी उम्मीदें क्यूँ रखी!! क्यूँ मैंने तुमसे उम्मीद की और तुमने मुझसे! क्यूँ सिलसिला ये साथ का चलता रहा सालों तक?क्यूँ तुमने मेरी रुखसत के वक़्त, भरी निगाह से मुझे देखा और कुछ कहते कहते रह गए?? क्यूँ मैंने उम्मीद की तुमसे के तुम आओ  थाम लो हाथ मेरा, रोक लो मुझको, मैं तुमसे दूर जाना नहीं चाहती थी…….तुम्हारे चेहरे पे मेरी निगाह टंग सी गयी थी! थोडा घबराकर शायद तुमने नज़र फेर ली थी, शायद बचना चाहते थे तुम उन सवालों से!! …दिल में हजारों बातें और जुबां खामोश…बिलकुल खामोश थी, तुम्हे चुप  रहने की आदत थी, कुछ कहने से पहले सौ बार सोचते थे, शायद इसी चुप्पी को मैं पसंद करती थी, शायद इसी चुप्पी से मुझे प्यार हुआ था, और शायद इसी चुप्पी ने मुझे तुमसे दूर ला फेका!!

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