Monday, September 19, 2011

कुछ तो साथ ले जाता, मुझे छोड़ के जानेवाला

मेरे  सिरहाने  जो  ये  तुम्हारी  यादें  पड़ी  हैं  न ,
इन्हें  अब  ले  जाओ ,
देर रात  तक  नींद  नहीं  आती  है ,
एक  एक  करके  हर  एक  याद  तुम्हारी ,
मुझको  मुझसे  ही  दूर  ले  जाते  हैं
रोकती  हूँ , संभालती  हूँ ,
खुद  में  रोज़  लड़ती  हूँ ,
पर  इनपे  कुछ  भी  असर  होता  नहीं ,
हर  शाम  जब  सूरज  कहीं  दूर  क्षितिज  में  डूब  रहा  होता है ,
मैं  उसके  दर्द  को  महसूस  करती  हूँ ,
वो  डूबना  उसका ,  महज़  छुपना  नहीं …
कई  बार  चाह  खुद  को  समझाऊं , के  वो  तो
आँख  मिचोली  खेल  रहा  है  इस  चाँद  के  साथ !
के  वो  तो  गया  है  कल  फिर से  आने  के  लिए !
लेकिन  नहीं ! मैं  नहीं  समझा  पाती  हूँ  खुद  को !
एक  ही  सोच , दिल  में  घर  किये  बैठा  है ,
एक  ही  डर  धडकनों  में  आवेज़ां  है ,
वो  जा  रहा  है , फिर  कभी  न  आने  के  लिए !
ये  रात  ये  चाँद  उसका  इंतज़ार  करते  रहेंगे ,
और  नहीं.......वो कभी   नहीं  लौटेगा !
ठीक  तुम्हारी  तरह !
हाँ  ठीक  तुम्हारी  तरह ,
जिस  तरह  एक  दिन  तुम  गए  न  लौटकर  आने  के  लिए
ये  चाँद  अकेला  है ,
बिलकुल  मेरी  तरह!!

हर  एक  याद  उसने  मेरे  घर  में  छोड़ दिया ,
कुछ  तो  साथ  ले  जाता, मुझे छोड़ के जानेवाला !

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