Monday, October 24, 2011

एक पुराना रिश्ता

हल्के नीले, गुलाबी ओर सफ़ेद रंग की धारी वाली शिफोन की साड़ी पहने मैं चौखट पर तुम्हारा इंतज़ार करती डूबते सूरज को देखती रही, सूरज धीरे धीरे सुर्ख लाल रंग का होता जा रहा था और मेरा दिल......... मेरा दिल भी उसी के साथ डूबता जा रहा था, सोच ने जैसे अपनी दिशा तय कर ली थी, उन दिनों के एहसास और भी गहरे होने लगे थे जब तुम्हारे हर वादे पर मुझे ऐतबार होता था! उनदिनों सब कुछ कितना ख़ूबसूरत नज़र आता था! एक ख़ाब सी ज़िन्दगी थी, जो हमदोनो जिया करते थे, हर तरफ़ खुशबू सी फैली होती थी, तुम्हारा मुस्कुराता चेहरा हर वक़्त मेरी नज़र के सामने होता था, और तुम्हारे चेहरे की वो मुस्कान देखकर हर बार एक ही फैसला करती थी, “मैं तुम्हारे लिए कुछ भी कर सकती हूँ! ” हाँ और ऐसा ही हुआ भी …उस दिन जब बाबूजी को हमदोनो के बारे में मालूम हुआ, वो कितना नाराज़ हुए थे, सबसे कह दिया था, चाँदनी से इस घर में कोई बात नहीं करेगा, सारे रिश्ते टूट गए,  आज से ये हमारे लिए मर गयी!!! बहुत तकलीफ़ हुई थी मुझे, उनकी नाराज़गी ने तो मनो मुझे तोड़ ही दिया था, क्यूंकि मैं उनसे भी उतना ही प्यार करती थी जितना तुमसे! लेकिन उस दिन तुमने मुझसे कहा के “सबकुछ छोड़कर मेरे साथ चल सकोगी” और मैंने कुछ भी सोचे बिना उस घर को लौट कर जाने वाले रस्ते से हमेशा के लिए अपने कदम हटा लिए थे! हाँ चली आई थी तुम्हारे साथ, तुम्हारे शहर में, तुम्हारे दुनिया में! तुम्हारी दुनियां को मैंने अपनाया और अब यही मेरे लिए अपनी हो गयी थी .........मुझे तो जैसे… ..जैसे पर लग गए थे ,तुमने मेरी ज़िन्दगी में अनगिनत खुशियाँ भर दी … उस दिन जब तुमने मुझे शादी का जोड़ा हाथ में थमाते हुए कहा “मेरी देखभाल कर सकोगी ? बहुत शरारती बच्चा हूँ मैं ” तुम्हारी बात सुनकर शर्म से मेरा चेहरा लाल हो गया था, मैंने अपनी नज़र झुका ली थी, और फिर जब मंदिर में फेरे लेते वक़्त तुमने मेरा हाथ थामा ..तो ऐसा लगा जैसे अब ये हाथ कभी नहीं छूटेगा, जैसे ये ज़िन्दगी अब आसान हो गयी ! जैसे मेरी ख़ामोश दुआ अपना असर कर गयी !!!!!!!!!
दिन गुज़रते गए, और दिन के गुजरने के साथ, हमारा रिश्ता पुराना होता गया! वादे तुम अब अभी करते थे, पर उसे पूरा कर पाना अब तुम्हारे बस में न था, हमदोनों साथ थे, हमारी मंजिल भी तो एक ही थी, लेकिन तुमने चार कदम साथ चलके अपनी मंजिल बदल ली अपने रास्ते बदल दिए ! हाँ तुम ज़िम्मेदार हो गए थे और अब शरारती भी कहाँ रहे थे तुम, अब तुम्हारे पास कुछ कहने या सुनने का वक़्त ही कहाँ था! साथ तो अब भी चल रहे थे लेकिन ऐसे जैसे रेल गाड़ी की दो पटरियां , जो चलती तो साथ ही हैं पर कभी मिल नहीं पाती !

आज इतने सालों बाद भी तुम्हारा दिया वो गुलाब का फूल, मेरे किताब के उस पन्ने में रक्खा है, पर जाने क्यूँ वो अब खुशबू नहीं देता! शायद उसकी खुशबू भी तुम्हारे प्यार की तरह बिखर गयी और बिखर के ख़त्म हो गयी है मेरे लिए! आज सुबह जब ड्राईवर ने मुझसे कहा के तुम शाम मुझे साथ ले जाने के लिए जल्दी आओगे! सुनके अच्छा लगा और ये सोचा के और एक बार भरोसा करूँ तुम्हारे किये वादे पर, ….मैंने हलके नीले गुलाबी और सफ़ेद रंग की धारी वाली शिफोन की वही साड़ी पहनी है जो तुम शादी की पहली सालगिरह पर लाये थे, याद है कितने शौख़ से दिया था तुमने मुझे! जब मैंने तुमसे कहा के “मेरे लिए इतने हलके रंग की साड़ी क्यूँ लाये?” तो तुमने कहा था “तुमपे हर रंग खिलता है ” ये सुनके मेरा चेहरा शर्म से लाल हो गया था ! पर न वो चेहरे की लाली है आज , न मुस्कराहट का उजाला ही, तुम्हारी चांदनी अकेली है, सीर्फ तुम्हारे इंतज़ार में ! एक उम्मीद है , शायद तुम इस बार वादा निभाओगे, शायद तुम आज लौट के आओगे!

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