Friday, December 2, 2011

क़यामत

बरसों  से  जुड़े  थे  हम, हमारा  रिश्ता  अब  तो  अपने  जन्म  की तारिख  भी   भूलने  लगा  था, रोज़  सुबह आँख खुलते  ही  तुम्हारे  चेहरे  को  देखना, चाय  बनाकर  तुम्हे  जगाना  और  तुम्हारा कहना  “बस  थोड़ी  और  देर सोने दो  ना” मुस्कुराते  हुए  तुम्हे  दोबारा  आवाज़  लगाती, थोड़ी  देर  और  मनाती  और  फिर  जब  मैं  तुमसे रूठ  जाती  तब  तुम  उठकर  कहते  “अरे मैं   तो  मज़ाक  कर  रहा  था” और  चाय पीते  हुए  मुझसे  कहते ….”जिस दिन  तुम्हारे  हाथ  की  चाय  नहीं  मिलेगी  मेरी  तो सुबह  ही  नहीं  होगी!” मैं  शर्माते  हुए  वहां  से  चली  जाती और  तुम्हारे  लिए  नाश्ता  बनाती, दिनभर  घर  के  काम  में  उलझी  रहती  और  साथ  ही  साथ  इंतज़ार  करती  के कब  शाम  होगी  और  तुम  लौट  के  वापस  आओगे, मेरे  पास  अपनी  चांदनी  के  पास! …..ऐसा लगता  था  के किसी  को  ख़ुशी  का  पता  पूछना  हो  तो  वो  मेरे  घर  में  आ  जाए, जहाँ  वो  सालों  से  रहती  थी ……..मैं  बहोत खुश  थी  और  सोचती  थी  के  वो  ख़ुशी हम  दोनों  के  अन्दर  है! जाने  क्या  हुआ  के  अचानक  ही  एक  दिन तुमने  कहा……….. "अब हम  साथ  नहीं  रह  सकते, हमारे  रिश्ते  में  अब  कुछ  नहीं  बचा  है, पहले  तो चंद  ख़ाबों का  सहारा  था, अब तो  वो  भी  जाता  रहा! एक  दर्द  सा  उठा, और  अन्दर जैसे  कुछ  टूट  गया! ये  क्या  हुआ, ऐसा, ऐसा  कैसे  कहा  तुमने, आख़िर  क्या चूक  हो  गयी  मुझसे  इस  रिश्ते  को  निभाने  में! निःशब्द, प्राणहीन  सी खड़ी रह  गयी  मैं! तुमने  आलमारी  से  अपने  कपड़े  निकाले, जुराबें  निकाली  और  जाते हुए  मुझसे  कहा, पैसों की  चिंता  मत  करना, मैं  हर  महीने  तुम्हे  भेजता रहूँगा! मैं  अपलक   देखती  रही तुम्हे जाते हुए, लगा जैसे कोई बुरा सपना था, तुम अभी आओगे और मुझे अपनी बाँहों में भर लोगे!…..तुम  चले  गए!! पूरे  एक महीने  तक  मैं घर  से  बहार  नहीं  निकली ….दिन  रात  रोती  रहती ….और  उस  एक  चूक को  ढूँढने  की  कोशिश  करती  जो शायद  मुझसे  हो  गयी  थी  अनजाने  में!! एक दिन  तुम्हारा  मनी  ऑर्डर  आया ……….और  साथ  ही  एक  चिट्ठी भी! “मैंने  शादी  कर  ली है ….मुझे  अपनी  ही  एक  कुलीग से  प्यार  हो  गया  था, और  ये  मैं  तुम्हे  बता  नहीं पाया, हिम्मत  ही  नहीं  जुटा  पा  रहा  था, लेकिन  इन  दोनों  रिश्तों  को  एक  साथ  निभाना मेरे  बस  में  नहीं  था अब, फैसला  तो  करना  ही  था,  इसलिए   मैंने  तुम्हे  छोड़ने  का  फ़ैसला  किया” चिट्ठी  पढ़ने  के  बाद  अनायास ही  मेरे  चेहरे  पे  मुस्कान  फ़ैल गयी, हाँ  शायद  इस  वक़्त  मुझे  रोना  चाहिए  था, पर  मैं  मुस्कुरा  रही  थी, खुद पे  हंसी  आ  रही  थी, ज़िन्दगी  में  रिश्ते  को  मायने  देते  देते, मैंने  तो रिश्ते  को  ही  अपनी  ज़िन्दगी  मान  लिया था, सोच  समझ  सब  बंद  कर  दिया  था, बस तुम्हारे  सहारे  ही  ज़िन्दगी  गुज़ार  रही  थी, कितनी  बेवकूफ़  थी मैं , एक  बार  नहीं सोचा के  रिश्तों  का  क्या  है, आज  बनते  हैं  कल  टूट  भी  तो  सकते  हैं ….और हमारा रिश्ता  तो  सीर्फ  एक  फ़ैसला  मात्र  था, और  फैसले  तो  बदले  भी  जा  सकते  हैं  ना! तुम्हारी  चिट्ठी  की  आख़िरी लाइन  “तुम  भी  शादी  कर  लेना  अपनी  पसंद  से” अपनी पसंद ???? मेरी  पसंद  तो  तुम  थे  ना!!

 
दो  चार  कदम  बस  साथ  चलके  तुमने  अपनी  राह  ली, मैंने  भी किनारा  कर  लिया,
ख़ामोशी  की  एक  दिवार  जो  बरसों  से  दरमियान  थी, वो  आज  टूटने को  है,
तुमने  मिलने  का   वादा  किया  है , आज  तुम  आओगे , शायद  क़यामत की  तारीख़  आ  गयी!



2 comments:

  1. Tukdo tukdon men Chandani ko parh rahe hain kaafi samay se, utsukta barhti ja rahi hai poori tarah se janane ki. Kaun hai, kahan se aayee hai, kis lok ki wasi hai ye Chandani? aur kya sochti aur karti hai is anaam wa nisthur vyakti ko chahne aur apni bhavnaon ko ruswa karne ke siwa. Kya use apni aatma ki bilkul parwah nahi? ......RD

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  2. Reply by Chandani:
    hmmm. ek samanya si ladki hai, jisne apni zindagi se kuchh zyada hi ummeedein bandh rakhi thi, bachpan se kismat se zyada apne karm par yakin karti thi, lekin jaise jaise umra barhti gayi, kismat ne apni taqat ka ehsaas diyalaya isey!!
    jahan tak chahat ka sawal hai....iske baare mein seerf itna hi kehna chahti hai Chandani!

    "ishq par zor nahi hai ye wo aatish ghalib,
    jo lagaye na lage aur bujhae na bane

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