Saturday, February 4, 2012

दरारें

कल रात नींद आई या नहीं कुछ याद नहीं, सुबह बिस्तर से उठी तो आँखें जैसे खुलने से इनकार कर रही थी,पलकें भारी थी, मुह धोया एक हाथ में चाय की प्याली और दुसरे हाथ में डायरी लिए बालकनी में आ गयी, डायरी उठाके जैसे ही उस दिन का पन्ना पलटा..... वो शाम आँखों के सामने एक बार फिर से आ गयी! 

याद है तुमने अचानक ही मेरी कलाई पकड़ी थी और बड़े अंदाज़ से कहा था “अभी ना जाओ छोड़कर के दिल अभी भरा नहीं”, मैं चुप थी, और तुमने मेरी उस अनकही बात को समझ लिया था… तुम जानते थे मैं कितना घबडाती हूँ तुमसे दूर जाने से, यदि मजबूरी ना होती तो शायद मैं कभी माँ के पास तुम्हे छोड़कर इतने दिन के लिए ना जाती! मुझे मनाते हुए तुमने कहा था कल चली जाना…मैं अब भी चुप थी उस शाम तुमने मेरे लिए अपने हाथों से चाय बनायी थी….तुम्हारे मनाने का भी अंदाज़ बस अलग ही था… और चाय थमाते हुए कहा था… "अब तो लोग जोडू का गुलाम कहने लगे हैं!” हम दोनों कितना हँसे थे उस बात पर….मेरे चेहरे पे उदासी तुमसे बर्दाश्त नहीं होती थी…और बस ऐसी कोई बात करते के मैं हंस पड़ती! मुझे हँसता देख तुम भी मुस्कुराते और कहते….बस अब लग रही हो ना मेरी चाँद! मुझे अब भी याद है,अगली सुबह जब मैं ट्रेन में बैठी और ट्रेन चली… तुम्हारी आँखों से आंसू के कुछ बूँद छलके थे, ......तुम मेरा हाथ छोड़ने को तयार ही नहीं थे, बस एक ही बात थी तुम्हारे ज़हन में …मत जाओ....... मैं एक दिन भी तुम्हारे बगैर रह नहीं पाउँगा!..........ट्रेन कि रफ़्तार बढ़ी और हमारा हाथ छूटा, हमदोनों एक दुसरे को अपलक देखते रहे!
डिलीवरी के बाद जब मैं वापस लौटी…घर में कुछ बदला बदला सा लगा! पता नहीं क्या…पर कुछ तो था! दीवारों पे तो अब भी वही हल्का गुलाबी रंग था….बेड और कार्टेंस भी अपनी जगह पे थे…और लिविंग रूम में वो तस्वीर (हमारी तस्वीर) अपनी जगह पे ही लगी थी….हाँ थोड़ी तिरछी हो गयी थी! वो मैंने सीधी कर दी… फिर भी कुछ था जो अलग सा था! मुन्ना तीन महीने का हो गया था….पूरे छः महीने अलग रहे थे हम…शादी के बाद, ऐसा पहली बार हुआ था, और इस बीच मैं दिन रात तुम्हारे बारे में ही सोचा करती थी! उस दिन हॉस्पिटल जाते वक़्त भी बस एक ही ख्याल …बस एक ही चेहरा मेरी नज़रों के सामने घूमता रहा….तुम्हारा चेहरा…दर्द को बेअसर करने के लिए मैं उन लम्हों को याद करती रही…जब तुम मेरे चेहरे पर एक मुस्कान देखने के लिए जाने क्या क्या करते थे! पर आज………………….. आज ये क्या हो रहा है…घर में कुछ बदला बदला सा क्यूँ लग रहा है! तुम कहाँ हो ऋषि….कब आओगे! हाँ मैंने सोचा था दो दिन पहले आ के सरप्राईज़ दूँगी, इसीलिए तुम्हे बताया नहीं था….पर अब तो……….. सूरज भी छिप गया….! मुन्ना सो गया…और मैं बहार बालकोनी में खड़ी तुम्हारी राह देखती रही! शाम से रात और रात से सुबह हो गयी……...पर तुम नहीं आये!.............
बेवफा तू है इस बात का यकीं नहीं फिर भी…
तेरी तस्वीर में अब दरारें क्यूँ नज़र आती हैं!

3 comments:

  1. बेवफा तू है इस बात का यकीं नहीं फिर भी…

    achha shabd-chitra uukera hai aapne... lekin isme bhi wahi baat hai... dard... kuch khushnumaa bhi likhen kabhi...

    -Ranjan

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  2. बहुत पहले मैंने फेसबुक पर लिखा था - "खुशी अपनी खुशबू देर तक नहीं बचा पाती है, मगर उदासी किसी अगरबत्ती की तरह होती है. जो बुझने के बाद भी एक भीनी सी सुगंध कमरे में रोक कर रखे रहती है"

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