Thursday, March 15, 2012

दामन के साए

दिन को इक बार बुझा कर तुमने,
ऐसी एक रात कुछ जलाई थी,
सौंधी सी ख़ुश्बू तेरे जिस्म कि वो
मुझको मेरे जिस्म से यूँ आई थी,
रात खामोश थी, बस दूर तक ख़ामोशी थी
तेरी आँखों में डूबते लम्हे,
अपने हाथों से कुछ फ़िसलते पल,
जिनको देखा नहीं सीर्फ....
महसूस किया था मैंने,
खेंच कर तूने जब मेरा आँचल,
मेरे कानों में कुछतो बोला था,
नज़रें नीची किये,तेरा दामन थामे,
मैं चली आई थी तेरे पीछे
और रखकर तेरे ज़ाने पे सर
थोड़ा घबराकर थोड़ा शरमाकर
सीर्फ एक बात कही थी मैंने
तुम मेरे हो के नहीं बस इतना राज़ खुल जाए
जीतेजी एक पल सुकूं का मुझे मिल जाए
मेरे हाथों को तब तुमने थाम,
डूबकर आँखों में मेरी देखा था,
शब्द तब ग़ुम थे और होठों पर
एक मुस्कान सी यूँ फैली थी,
और फिर तुमने मुस्कुरा भर कर
उन् सवालों को मेरी टाला था!
रात भर का वो एक हसीं सफ़र,
आज भी याद है ज़बानी मुझे
तेरे दामन के वो हसीं साए,
आज भी साथ मेरे रहते हैं,
तू नहीं है, कही नहीं फिर भी,
मुझसे अब भी वो बातें करते हैं!

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