Thursday, September 13, 2012

एक पल एक सुकूं, एक दर्द, एक जुनूं एक मैं और एक ग़म

आज उसका जन्मदिन था, वो बचपन से ही अपने जन्मदिन को लेकर बहुत खुश रहा करती थी...फिर अब क्या हो गया था....आज उसकी आँखों में ये पानी कैसे! आखिर क्या वजह रही होगी के वो खुद को संभाल न सकी! ऐसा कौन सा ग़म था उसकी ज़िन्दगी में? सबकुछ तो था...भरा पूरा परिवार....सास, ससुर...पति...सभी थे फिर किस बात कि कमी थी!
 
कई बार हमें लगने लगता है के जो बीत गया..वो गुज़र गया और जिसको गुज़रे ज़माना हो गया उसे हम भूल चुके हैं! पर क्या ये सच है? क्या वाक़ई गुज़रे लम्हों को भुलाना मुमकिन है? क्या आगे बढ़ने का मतलब ये है के जो गुज़र गया उसे भूल जाओ? यदि हाँ, तो "वो" नासमझ थी! उसकी नासमझी ही तो थी के जिन लम्हों को गुज़रे ज़माना हो गया, वो उन्हें अब भी सीने से लगाए बैठी थी!
 
 
बचपन की यादें, माँ का प्यार, बहनों का दुलार, पिता का.......... हाँ यही वो पक्ष था जो अधुरा रह गया! बहुत कम उम्र थी उसकी जब उसके सर से पिता का साया उठ गया, ज़िन्दगी ने उसे सबकुछ दिया..बस वो वक़्त नहीं जो किसी भी लड़की की ज़िन्दगी में बहुत ज़्यादा मायने रखते हैं....जब एक लड़की बचपन को छोड़ जवानी की देहलीज़ पर कदम रखती है तो उसकी ज़िन्दगी में बहुत सारे बदलाव आते हैं...और ज़िन्दगी के हर मोड़ पर वो एक बार पलट कर देखती है....के उसका परिवार उसके साथ है के नहीं! दिशा के साथ भी ऐसा ही था...जैसे जैसे ज़िन्दगी में वो मकाम हासिल करती गयी...हर बार पलटकर देखा अपने परिवार की तरफ....सब थे उसके आसपास पर फिर भी कुछ अधूरा सा था....एक अधूरापन....जो तब आया था जब वो मात्र 14 साल की थी.......सुबह से शाम कैसे गुजरता उसे मालूम न होता....दिन भर पढ़ाई और शाम को खेल कूद .....पर जब घर में होती...तो अपनी बड़ी बहनों को पिता से बात करते देख...हमेशा निश्चय करती...एक दिन जब मैं बड़ी हो जाउंगी...तब इन्ही की तरह पिताजी के पास बैठकर बात करुँगी, उन्हें हर छोटी बड़ी बात बताउंगी और सलाह लूंगी ...एक दिन मैं उनका बेटा बनूँगी, उनको भी गर्व होगा मुझपर.... ये लोग तो चार दिन की मेहमान हैं...सब की शादी हो जाएगी...फिर सिर्फ मैं पिताजी और माँ बस! और फिर ये सोचकर ही खुश हो जाया करती! एक बार एक पंडित ने भी दिशा की इस सोच पर मुहर लगा दी...."आपकी ये छोटी वाली बेटी ही आपके बुढ़ापे का सहारा बनेगी! अभी थोड़े चंचल स्वाभाव की है, पर देखिएगा ये बहुत लायक निकलेगी, ये इसकी हाथों की रेखाओं में लिखा है, के आपलोगों की बहोत सेवा करेगी!"............पंडित जी की बातें सुन, दिशा के इरादे और भी पक्के हो गए, वो पहले से भी ज्यादा निश्चिन्त हो गयी, के बस कुछ साल और फिर तो पिताजीके सबसे करीब मैं ही होउंगी! उस अभागी को ये कहाँ मालूम था...कि उसकी सोच...सीर्फ सोच मात्र ही रह जाएगी, के उसकी कामना कभी पूरी न होगी.....के उसकी सांसें तो रहेंगी पर ज़िन्दगी बहोत जल्द उसका दामन छोड़ देगी!
 
 
"पर कल तक तो बिलकुल ठीक थे, फिर आप आई एम् सोरी कैसे कह सकते हैं?, आपको मेरे पिता को बचाना होगा डॉक्टर, आप झूठ बोलते हैं...मेरे पिता हमें छोड़ के नहीं जा सकते...जब आपको इलाज करना नहीं आता तो क्यूँ रोका आपने हमें....दिल्ली जाने देते....वहाँ ये बिलकुल ठीक हो जाते....आपने हत्या कि है हमारे पिता कि...कभी माफ़ नहीं करेंगे हम....ओह कैसे सम्भालूंगी मैं माँ को..कैसे सम्भालूंगी अपने परिवार को !" भरी कदमो से कांता ने घर की ओर रुख किया......... जिस ऑटो रिक्शा में कांता पिताजी के साथ गयी थी .....उसी ऑटो में बैठी थी अब भी ....पर पिता का सर उसकी गोद में था, न चेहरे पर वो खिलखिलाती हंसी और न होठों पर वो पान की लाली...पिता को कभी इस हालत में देखना पड़ेगा....ऐसी कल्पना भी न की थी, कांता अपनी सोच में उलझी थी, आँखों के आंसू थमने का नाम ही न लेते थे, के अचानक ऑटो रुकी......घर आ गया था...........कांता अब भी हिम्मत न जुटा पाई थी....."माँ से क्या कहूँगी, कैसे कहूँगी.....क्या होगा मेरी छोटी बहनों का....कैसे संभालू सब.........आह..........!" ऑटो की आवाज़ सुन...माँ ने गौरी जी कि पूजा को बीच में ही छोड़ दिया....और कहा...जा दिशा...तेरे पिताजी आ गए.. उनको ले आ".दिशा उठती उसके पहले ही ...कांता भीतर आई, कुछ भी कहने की हालत न थी उसकी....सीर्फ इतना ही कह सकी "पिताजी छोड़ गए सबको माँ" सब रोये....पर दिशा के आंसू जैसे सूख गए थे, जैसे वो अचानक ही बड़ी हो गयी थी....ऐसा लग रहा था जैसे ज़मीं तो है...पर सर पर से छत चला गया......
 
 
वक़्त गुज़रा और वक़्त के साथ सब आगे बढ़ गए.......अपनी अपनी ज़िन्दगी में मशगूल हो गए, पर दिशा के अन्दर कुछ रह गया था, कुछ ऐसा जो उसे आगे नहीं बढ़ने दे रहा था! वो हँसते हँसते रुक जाती, लोगों के बीच उसे भीड़ महसूस होता, दम घुट'ता उसका, और अकेली होती तो वक़्त जैसे खंज़र लिए उसका पीछा कर रहा हो! कहीं चैन न था, बस बेचैनी, दर्द..अकेलापन, सारे रिश्ते उस'से दूर होते जा रहे थे, वो सबसे खुल के हर बात कहना चाहती....पर फिर सोचती के क्या कहूँगी, उसका मन करता किसी ऊँची पहाड़ी पर जा के जोर जोर से चिल्लाये, रोये...पूछे उस पंडित से ..उसने झूठ क्यूँ कहा था...क्यूँ कहा था के उसके पिता का साया हमेशा बना रहेगा....पर किसी से कुछ न कहती......पर अन्दर ही अन्दर मरती रहती....हर दिन..हर पल..हर क्षण, पर कोई न सुनता!
 
 
लोग कहते हैं ख़ामोशी की अपनी जुबां होती है....क्या ये सच है?

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