Tuesday, September 18, 2012

बारिश की बूँदें और तुम

बारिशों के दिन थे, हवाओं में जैसे ख़ुश्बू सी फैली थी,
जब दिन इतने खूबसूरत होते थे...तब तुम आते थे...
तुम्हारे आने की खबर हवाओं से मिलते ही,
मैं झटपट खड़ी हुई, घर के सारे परदे बदले...
चादर, कुशन्स..सब बदल दिये...
तुम अक्सर कहा करते थे...
जब हम बीसवी मंजिल पर अपना आशियाँ बनाएँगे..
और तुम्हारी बात बीच में ही काटते हुए मैं तुमसे पूछती ...
"बीसवी मंजिल पर क्यूँ" तो तुम कहते...
"वहां दूर-दूर तक कोई तुम्हे न देख सकेगा! सीर्फ मैं और तुम...
तुम सीर्फ मेरी हो! तुम्हे कोई और देखे तो खुद पे काबू रखना मुश्किल हो जाता है"...
और कहकर तुम मुझे बाँहों में भर लेते....
याद है मुझे अब भी.... तुमने हर बार मुझसे एक ही सवाल किये थे
"चाँद, तुम मुझे छोड़कर तो न जाओगी कभी?" और मैं तुम्हारा हाथ थाम हर बार तुम्हे आश्वासन देती!
मालूम न होता कि वो आश्वासन मैं तुम्हे दे रही हूँ या खुद को!
क्यूंकि तुम्हारे बगैर जीने की तो मैंने कभी कल्पना भी न की थी,
क्यूंकि जाना तो तुम्हारा निश्चित था...और तुम चले गए...एक लम्बे अंतराल के लिए,
अंतराल जो शुरू तो हुआ पर ख़त्म होने का नाम ही न लेता था!
जाते वक़्त तुमने कहा था....अपार्टमेन्ट की बीसवी मंजिल पर आशियाँ चाहिए के नहीं?
उसके लिए पैसे भी तो कमाने पड़ेंगे ना चाँद साहिबा?....
मैं तुम्हारे सीने से लगकर रो पड़ी थी...जाने क्यूँ एक अनजाना डर जैसे मेरे दिल में घर कर गया था....
कुछ समझ नहीं आ रहा था कि किस बात का डर है....दर्द तुम्हारे जाने का है....या डर तुम्हारे लौटकर न आने का है!
 
अक्सर प्यार में हम जिसे अपना सबकुछ मान बैठते हैं....उसका ना रहना..हमारी ज़िन्दगी को पूरी तरह अधूरा कर देता है! ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी हुआ! तुम्हारे जाने के बाद मेरी ज़िन्दगी चलती तो रही...पर मैं उस पल में कहीं रुक सी गयी थी
 
उस पल में जब जाते वक़्त तुमने पलटकर देखा था....और मेरी आँखों में आंसू देख तुम दौड़कर वापस आये थे....
और कहा था..."मेरे बाद या मेरे बगैर...हमेशा मुस्कुराती रहना.....तुम्हारी मुस्कान कसम से जानलेवा है चाँद" और ये सुनते ही मेरे चेहरे पे मुस्कान बिखर गयी थी!
 
पूरे तीन साल गुज़र गए...और तीन साल में हर एक दिन हर एक पल बस तुम्हारी ही यादों का सहारा रहा,
न ऐसी बारिश ही हुई और न खुशनुमा हवाओं ने ही मेरे घर का रुख किया...शायद इनको भी तुम्हारे आने का इंतज़ार था!
 
घर में मैंने आज ढेर सारे दिये जलाए हैं...और दीयों को सजाते वक़्त भी मुझे तुम्हारी ही बातें याद आती रही...
याद है एक बार इसी तरह मैं घर को सजा रही थी तो तुमने कहा था "मुझे और किसी रौशनी की दरकार नहीं...मुझे तो पूरा चाँद ही मिल गया!"
 
मैंने आज नीले रंग कि साड़ी पहनी है, तुम्हे नीला रंग कितना पसंद था ना! मेरे लिए हमेशा तुम नीले रंग की ही साड़ियाँ लाते थे! और जब मैं तुम्हे सवालिया निगाहों से देखती तो तो तुम कहते "नीले रंग की साड़ी में ऐसी लगती हो जैसे...नीले गगन में दुधिया चाँद!...
तुम्हारे साथ गुज़रे लम्हों को याद करते कुछ पता ही नहीं चला के कब, शाम के चेहरे पर रात ने अपना आँचल फैला दिया! मैंने अपनेआप  को एक और बार समेटा और बालकनी में आ गयी...दूर जहाँ तक मेरी नज़र गयी....सीर्फ तुम्हारे ही निशाँ तलाशती रही.. वक़्त गुज़रता गया और तेज़ हवाओं ने अपना रुख मोड़ लिया! बारिश कि बूंदों ने भी आखिर थक' के बरसना छोड़ दिया!
एक और शाम बुझ गयी तेरे ख्याल में,
एक और बार हम.. छले गए प्यार में,
एक और बार दर्द दिल में थम सा गया है,
एक और रात गुजरेगी तेरे इंतज़ार में!
 

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