Thursday, September 20, 2012

बस रस्म निभाने के लिए

वो हर बार आया तो बस जाने के लिए,
उसने रिश्तों को बनाया तो बस रस्मों को निभाने के लिए,

उसके दिल में थे जज़्बात,
होठों पर ही मेरा नाम,
जो मेरे साथ भी चला
तो बस रस्म निभाने के लिए
वो जो भी था, तसल्ली थी
के हाथों में है उसका हाथ,
पर उसने हाथ भी छोड़ा
तो बस रस्म निभाने के लिए

के जबतक साथ था मेरे,
मुझे अपना सा लगता था,
कभी तन्हाइयों में भी,
ये दिल पूरा सा लगता था,
पर उसने साथ भी छोड़ा
तो बस रस्म निभाने के लिए

जो जाना था चला जाता,
मेरा दिल तोड़कर जाता,
के वो तस्वीर जो उसने
अपने हाथों से बानाई थी,
के वो शामें जो उसने
अपने हाथों से सजाई थी,
वो शामें और वो तसवीरें,
तो अपने साथ ले जाता,
के जाते वक़्त भी उसने
बस इतनी बात बोली थी ,
के मैं जो तुमसे जुड़ा था वो
बस रस्म निभाने के लिए!

के अब भी आहटें उसकी,
मेरे घर से गुज़रती हैं,
के अब भी याद में उसकी,
मेरी रातें सिमटती हैं,
के अब भी दिल की धड़कन में,
वही तस्वीर बाकी है,
के अब भी ज़िन्दगी मेरी,
उसी के साथ मुमकिन है,
के आये लौटकर फिर से,
भले ही रस्म निभाने के लिए!

 

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