Friday, September 21, 2012

नादां दिल

क्या कुसूर उसकी बातों का था, या नादानियां मेरे दिल की,
क्या दर्द उसकी आँखों में था, या बेचैनियाँ मेंरे मन की,
न उसने बाँधा था अपने लफ़्ज़ों से, ना कोई आस ही दी थी,
फिर भी उसके जाने से सब खाली सा क्यूँ हो गया!

मुझको तेरे भी अन्दर वो एहसास चाहिए,
छोटी ही सही एक मुलाक़ात चाहिए,
मुझको मेरी वफाओं का कुछ तो सिला मिले,
मेरी हथेलियों पे तेरा नाम चाहिए!

बदनाम करके भी मुझे मशहूर कर गया
वो शख्स जो कहता था तूने ज़िन्दगी में क्या किया?

हर  एक मुस्कराहट का हिसाब मांगती है ज़िन्दगी,
खुशियाँ किसी की झोली में बस यूँही नहीं बरसती!

कभी दुश्मनों ने तोड़ा, कभी दोस्तों ने लूटा,
के दर्द मुझे मिलता ही रहा किश्तों में!

किश्तों किश्तों में वो मुझे मिलता रहा,
मेरे सब्र की हर मुमकिन इम्तिहाँ लेता रहा!


उसकी खामोशी भी अपनेआप में मुकम्मल है!

चाँद तकता रहा है दूर तलक,
कोई उसको बुझाए तो नींद आए हमें!

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