Thursday, September 6, 2012

चलो अच्छा हुआ तुमने फुर्सत दे दी,

दिन रात तुम्हारी देखभाल करना, तुम्हारी ख़ुशी में खुश होना, और तुम्हारे ही दर्द में रोना! ये तो जैसे मेरी आदत सी बन गयी थी, तुम्हे एक छींक भी आये तो ऐसा लगता जैसे मेरी धड़कन बढ़ गयी! हाँ रिश्ता तो वो नहीं, पर मेरे लिए तुम एक मासूम बच्चे से थे, जिसकी हर अदा मुझे प्यारी थी, जिसके हर ख्वाब मैंने अपनी आँखों में पाले थे, जिसकी खूबसूरत मासूम आँखों में मेरी दुनियाँ सिमटी थी, जिसकी पेशानी का पसीना जैसे काली सियाह रात, और जिसकी एक हलकी सी मुस्कराहट जैसे अमावास के रात में ईद का चाँद! न दिन गिने, न महीने, न साल, बस पल देखे.........वो पल जो मैंने तुम्हारे नाम किये.....और वो तुम्हारे पल...जिनपर सीर्फ मेरा हक़ था! "था" हाँ अब नहीं! उस रात जब तुमने अचानक ही कहा के "मैं हार गया हूँ, पिताजी नहीं माने, बहुत कोशिश की .... पर उनका फैसला अटल है...वो इनटर्कास्ट मैरेज के अब भी खिलाफ हैं, और मुझमें अब और हिम्मत नहीं बची के मैं लड़ सकूँ...........मुझे जाना होगा, तुमसे दूर".......... कुछ दूर जाकर तुमने पलटकर कहा...."मुझे भूल जाना".........ऐसा लगा मनो ज़िन्दगी हाथों से निकल गयी.....जैसे रेत का घर बनाया था और समंदार के तूफ़ान ने सबकुछ मिटा दिया.......... और मैं स्तब्ध देखती रह गयी! बस यही सोचती रही, के मैं तो शायद रह भी लूं, तुम कैसे रह सकोगे मेरे बिना! तुम्हारे लिए तो मैं ही सबकुछ थी...ऐसा अक्सर तुम कहा करते थे, "के तुम बिन एक पल भी बोझ सा गुज़रता है, के तुम्हारी हंसी ही मेरी ज़िन्दगी है, के जिस दिन तुम न होगी...मेरी तो हस्ती ही ख़त्म हो जाएगी!
कल रात तुम्हारी दुल्हन को देखा, और उसके पास तुम्हे मुस्कुराते पाया! सारे भरम टूट गए!
चलो अच्छा हुआ तुमने फुर्सत दे दी!

2 comments:

  1. कई भरम का टूटना भी अच्छा ही होता है. वैसे मैं अभी मन्ना दा का एक गीत सुन रहा हूँ. बोल हैं "कसमें वादे प्यार वफ़ा सब, बातें हैं बातों का क्या?"

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