Friday, September 21, 2012

हर ज़ख्म तेरी याद मुझे दिलाती रही!

हर सुबह वो सरहदें मुझको रोकती रही,
हर सुबह तेरी आहटें मेरा दामन खीचती रही,
हर सुबह खुद को मैं संभालती रही,
हर सुबह तेरी चौखट से मैं लौटती रही,

हर दिन ये पल मुझपर भारी रहा
हर दिन ये हवाएं मुझसे पूछती रही,
हर दिन मैं राहों में भटकती रही,
हर दिन तेरे ख्वाब मैं सजाती रही,

हर शाम तेरी याद मुझे आती रही,
हर शाम खुद से मैं उलझती रही,
हर शाम तेरे नाम की शमा जलाती रही,
हर शाम पहेलियों में मेरी उलझती रही,

हर रात ये चाँद मुझ चिढ़ाता रहा,
हर रात तन्हाइयों में मेरी कटती रही,
हर रात उम्मीदों के दिए जलाती रही,
हर रात उन्हें खुद ही मैं बुझाती रही,

हर सांस तेरा नाम लिए चलती रही,
हर ज़ख्म तेरी याद मुझे दिलाती रही!

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