Friday, September 7, 2012

तुमने क्या झूठ कहा था माँ?

हमसब इतने स्वार्थी कैसे हो गए! सीर्फ अपनी ख़ुशी, और अपने ही दुःख के बारे में सोचते हैं, सीर्फ अपनी ज़िन्दगी जीते हैं और खुद कि मौत से डरते हैं... के जबकि इस जीने में ज़िन्दगी कहीं नहीं होती, और मौत के खौफ में हम सौ बार मरते हैं!
एक वक़्त था जब मुझे छोटी सी चोट लगती तो माँ बाद में आती, पहले पड़ोस वाली चाची आ जाती, और गोद में लेकर अपने घर ले जाती, जब माँ आती तो उनको खूब डांटती! कभी ऐसा महसूस ही नहीं होता के हम सीर्फ पडोसी हैं! सारा मोहल्ला, सारा शहर अपना था! जब कभी शाम को खेलते खेलते घर आने में देर हो जाती, और बाबूजी माँ से पूछते के "कहाँ है आपकी लाडली, पढ़ती भी है या सीर्फ खेल में ही मन लगता है" तो माँ बस मुस्कुरा भर के रह जातीं! मुझे अब भी याद है, अक्सर शाम को माँ अपने बाल बनाती, सिन्दूर, गाढ़ा सा सिन्दूर लगातीं, और उस सूती साड़ी की सलवटें ठीक कर लेती, और जब बाबूजी घर आते तो साथ बैठकर चाय पीती! फिर शर्मा अंकल आते और शर्मा अंकल के साथ बाबूजी बहार निकल जाते, दास आंटी और माँ की दो तीन सहेलियां, सब हमारे घर आते, और बस ....मेरे घर से जोर जोर से ठहाकों कि आवाज़ गूंजती! कभी ये महफ़िल मेरे घर में जमती, कभी किसी और घर में! पर जबतक ये सब एक दूसरे से मिल न लें, इनका खाना हज़म ना होता!
मुझे अब भी याद है,घर के सामने जो वो बड़ा सा खाली प्लाट था, उसके उस पार एक बहुत बड़ा बहुत घना सा पेड़ था, जिसपर दीदी अपनी सहेलियों के साथ झूला झूलने जाया करती, उस झूले पे झूलने के लिए जब मैं अपनी सहेलियों के साथ पहुचती तो दीदी कहती बाद में आना, और मैं रोती हुई घर आ जाती! माँ तब पुचकारती और कहती कल झूल लेना, आज अपनी गुडिया की शादी करवा लो, शादी कि बात सुनते ही मैं खुश हो जाती! और फिर हम सहेलियां गुड्डे गुड़ियों की शादी करवाते! फिर सबको, एक मिठाई  के दस टुकड़े करके खिलाते! हमें हँसता देख सब हँसते! याद है मुझे उन दिनों गर्मी कि छुट्टियाँ चल रही थीं, शाम को जब मैं खेलने जा रही थी तो मैंने बाबूजी को उनके दोस्त से बात करते सुना था, "पौधे लगाना चाहिए, पेड़ बहुत ज़रूरी है हमारे लिए"! अगले दिन, करीब ३-४ बजे के बीच मैं और मेरी सहेली दोनों ने उस मैदान में (हाँ मैदान ही था हमारे लिए वो छोटा सा प्लाट) ढेर सरे पौधे लगाए! और रोज़ एक रुटीन सा बना लिया था के जबतक उसमें पानी ना डालें हमें चैन ना मिलता, हर रोज़ उन पौधों को देखते, और एक दुसरे से सवाल करते के ये बड़े कब होंगे! दोनों के ही पास जवाब न होता!...हम फिर अपने खेल में मशगूल हो जाते, जबतक दोनों के घर से दो चार लोग बुलाने न आ जाते, हम नहीं जाते! हमदोनों को किसी और के साथ मन न लगता! बस एक दूसरे से बातें करते, और एक दूसरे के साथ ही खेलते रहते, एक साथ ही स्कूल जाते और लौट'ते भी साथ! कुछ दिन गुज़रे, वो चली गयी हमेशा के लिए, और जाते वक़्त कह गयी, "मैं तो न होंगी, पर तुम इन पौधों का ख्याल रखना, जब ये बड़े हो जाएँगे तब हम फिर से मिलेंगे....और तब मैं तुम्हे छोड़कर कभी न जाउंगी" ............वो चली गयी, और मैं देखती रह गयी! पहली बार महसूस किया था के दोस्त के जाने का गम क्या होता है! उसके जाने के बाद मैंने उसके हिस्से का भी भार संभाल लिया! अकेली ही जाती, क्यारियों में पानी डालती और पौधों से सवाल करती..."तुम बड़े कब होगे"...कोई जवाब न मिलता!
वक़्त गुज़रा मेरे बाबूजी का भी ट्रांसफर हो गया...........वो शहर छूट गया हमसे, जब सब छूट रहा था तब इतनी भी समझ न थी के ये समझ सकूँ के जो छूट जाता है वो बस छूट जाता है, जो वक़्त गुज़र जाता है वो बस गुज़र जाता है....गुज़रा वक़्त कभी लौटकर नहीं आता! मुझे रोता हुआ देख माँ ने मुझसे कहा था, "मत रो बेटा, एक दिन हम वापस आएँगे, और फिर सब पहले जैसा हो जाएगा, तेरी दोस्त भी आएगी वापस..फिर तुमदोनों खेलोगे, फिर साथ साथ स्कूल जाओगे, फिर चाची उसी तरह से गले से लगाएंगी,.....वही झूला होगा, वही बगीचा, वही रास्ते होंगे, सबकुछ पहले सा हो जाएगा......देखना एक दिन ऐसा ज़रूर होगा!
पर कहाँ हुआ माँ!....आज न तुम हो पास, न बाबूजी, ना वो रास्ते हैं, ना वो लोग! अब तो बस लोगों में ईर्ष्या है, द्वेष है, स्वार्थ है! कोई किसी की कहाँ सुनता है....................अब किसी घर से ठहाकों कि आवाज़ नहीं आती! अब कोई शाम ढले दोस्तों से मिलने नहीं जाता! अब तो बच्चे गुड़ियों कि शादी भी नहीं करवाते......अब किसी की दर्द में कोई और नहीं रोता!.............सब बदल गया माँ, कुछ भी पहले सा नहीं रहा!
तुमने क्या झूठ कहा था माँ?

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