Friday, September 21, 2012

वो शाम

इन बारिशों के मौसम में तुम और याद आते हो, तुम्हारे चेहरे की मुस्कान वो रिमझिम फुहारों सी, तुम्हारी पेशानी घनघोर घटाओं सी!

याद है एक बार जब बरसात हुई थी, किस तरह दीवानी सी किसी किशोरी की तरह, झूमती हुई सी मैं चल दी थी बीचो बीच सड़क के और फिर तुमने  मुझे डांटते हुए कहा था "तुम कोई बच्ची नहीं, बड़ी हो चुकी हो! इस तरह सड़क पर अल्लहड़ की तरह चलते हैं क्या?" मैंने जब रूटकर तुमसे मुह फेर लिया था, और आकर बैठ गयी थी तुम्हारे पास में।।।।तुम मेरा हाथ थामकर फिर से ले आये थे उन्ही बादलों के घेरे में, जहां बारिश की बूँदें पड़ती रही थी दोनों पर और तुम मुझे देखते रहे और मुस्कुराते रहे।।।मैं तुम्हारा हाथ थामे जाने किस दुनिया की सैर कर रही थी, भूल गए थे उस शाम हम हर एक रस्म को हर एक बंधन को।।।।

आज फिर बादल है, बारिश की बूँदें हैं और दूर तलक तुम्हारी यादें हैं!


 

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