Monday, October 15, 2012

मेरा चेहरा

ज़िन्दगी तेरे आईने में मेरा चेहरा..और नज़र आता नहीं,
किसी गैर को देखा है कई दफे,
हाँ एक चेहरा के जिसकी आँखें सूजी पड़ी है
जैसे हर रात उसकी रो रो के कटी हो,
जैसे कई रातों से नींद उस से आँख मिचोली खेल रही हो,
जिन आँखों में कभी काजलों का डेरा था,
वो आंखें, के जिनके हंसने कि आवाज़ दूर तलक जाती थी,
वो आँखें अब वीरान नज़र आती हैं,
वो एक चेहरा के जिसके होंठ कुछ खुश्क से हैं,
जैसे प्यास बरसों पुरानी हो,
वो एक चेहरा जिसपे कभी लाल रंग कि बिंदिया चमकती थी,
वो बिंदिया और नहीं चमकती एक काला दाग लगती है,
के जैसे अपनी आँखों कि उदासी को छिपाने के लिए,
कोई सुरमा लगता है,
ऐसा लगता है कोई और है, जो मेरे आईने में घुसकर बैठा है,
तेरे आईने में मेरा चेहरा..और नज़र आता नहीं!

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