Tuesday, October 16, 2012

क्या वो फैसला सही था?

हाँ वो अब भी वहीँ रहता है, कुछ अरसे पहले उसकी नौकरी छूट गयी, दूसरी मिली नहीं....या शायद उसने तलाशने की कोशिश नहीं की, उसने शेव भी करना बंद कर दिया है, उसके दोस्त कहते हैं के वो बिल्कुल मजनू सा बन बैठा है! जाने कौन सी लड़की होगी जिसने उसकी ये दशा कर दी, मैंने तो यहाँ तक सुना है कि उसकी पत्नी भी उसे चैन से जीने नहीं देती थी, और आखिर छोड़ के चली गयी उसे! ....बेचारा!....खैर, मैं चलती हूँ मुझे भैया ने कहा था जल्दी वापस आने, अपना ख्याल रखना आस्था, बाय!

निशा अपनी बात पूरी कर वहां से चली गयी, और आस्था आती जाती लहरों पे नज़र गाड़े माज़ी में डूब गयी...........

वो एक नीम का पेड़, जहाँ दोनों घंटों बातें किया करते थे, उस से थोड़ी ही दूर एक चाय की दूकान, हाँ वही चाय वाला....जिसे वो दो प्याली चाय देने कहता और जब चायवाला चाय ले के आता और आस्था को देने लगता तो चंदर चायवाला के हाथ से दोनों प्याले चाय के ले लेता फिर एक प्याली आस्था को देता...कई बार ऐसा होने के बाद एक दिन आस्था ने पूछ ही लिया, “वो देता है तो तुम उसे देने क्यूँ नहीं देते?” चंदर ने मुस्कुराते हुए कहा “मैं नहीं चाहता कि चाय कि प्याली पकड़ाते हुए वो तुम्हारी उंगली छूए” चंदर की बात पर आस्था बस हंसती रही, उसे ये सुध न रहा के वो कहाँ खड़ी है! उसकी हंसी की वजह ये भी थी कि वो खुश थी, ये सोचकर कि चंदर उस से कितना प्यार करता है! अचानक ही वो बोल पड़ी, “यदि मैं तुम्हे छोड़कर चली गयी तो...रह लोगे?” चंदर चुप रहा! कुछ बातें ऐसी होती हैं हमारी ज़िन्दगी में जिनका ज़िक्र मात्र भी सदमें से कम नहीं होता! दोनों...हाथों में हाथ डाले सड़क के किनारे चल रहे थे, और चंदर बोल पड़ा “आस्था, तुम्हारे बिना बस रात गुज़रती है, कमबख्त नींद नहीं आती बस रातभर घड़ी कि सुनियों को तकता रहता हूँ के कब सुबह हो और तुम्हारा चेहरा देखूं...जानती हो, उस रोज़, हाँ ‘उस रोज़’ ही कहूँगा, क्यूंकि ये तीन साल कैसे गुज़र गए मालूम ही नहीं चला, हाँ तो मैं क्या कह रहा था?

“तुम कह रहे थे, उस रोज़......”

“हाँ उस रोज़, जब पहली बार तुम्हे देखा था, तो देखते ही सोचा था के कोई इतना भी खूबसूरत हो सकता है क्या? और अगला ख्याल यही आया था के क्या तुम मेरी हो सकती हो? आई मीन....तुम जैसी खूबसूरत, चंचल और जैसा पहली बार देख के लगा था..खुले विचारों कि लड़की, को मुझ जैसा सिम्पल लड़का, जो न किसी से ज़्यादा बातचीत करता है, इन्फेक्ट मुझे तो लड़कियों से बात भी करने की हिम्मत नहीं होती..यदि कोई लड़की आ के मुझसे कुछ पूछे तो बस उसके सवाल का जवाब दे के वहां से चला जाता था, और ऐसा जवाब देता था के दोबारा बात करने न आये...न मेरे अन्दर कोई आदत ही थी, जैसे सिगरेट वगैरह पीने कि, हाँ दोस्त कहते थे के सिगरेट पीने से भी लड़कियों पर अच्छा इम्प्रेसन पड़ता है, पर मैंने पढ़ाई को छोड़ कभी किसी ओर ध्यान नहीं दिया! पापा ने दिल्ली आते वक़्त ही कहा था के ‘तुझे इतनी दूर पढ़ने भेज रहा हूँ, दोस्तों के साथ मस्ती करने नहीं, इस बात का ख्याल रहे, तू अकेला लड़का है मेरा... और तेरी बहनों कि ज़िम्मेदारी भी तुझपर है, मुझे कभी शर्मिंदा न होना पड़े!’ पापा कि वो बातें हमेशा याद रही, और बस कभी किसी ओर ध्यान नहीं दिया, फिर कई सालों बाद तुम्हारा.....चाची जी के घर आना, हाँ आस्था ऐसा नहीं के पहली बार तुम्हे देखा था, लेकिन शायद जिस शख्स को आप बचपन से देखते आये हो, और कुछ सालों तक न मिलो फिर अचानक ही सामने आये, तो...ऐसा सब के साथ होता हो ये ज़रूरी नहीं, पर मेरे साथ हुआ, तुम्हे पहली  ही बार जब देखा तो ऐसा लगा, जैसे इसे ही लव एट फस्ट साईट कहते हैं, हाँ तरीके से उस दिन पहली ही बार तो देखा था.. तुम्हे देखने के बाद बस एक ही सोच आई...काश तुम मेरी होती! जानती हो, वो जो उनदिनों मैं अक्सर शाम को तुम्हे दिखा करता था, तुम्हारे घर के सामने से गुजरता हुआ, वो इक्त्फाकन नहीं होता था..मैं अपने छत से देखता रहता था, और जब तुम बालकनी में आके खड़ी होती, तभी जल्दी जल्दी शर्ट और जींस पहन घर से निकल पड़ता, कि एक बार तुम्हे सामने से देख लूं....सच आस्था आज भी दीवाना हूँ मैं तुम्हारे लिए...चलो शादी कर लेते हैं!

आस्था..चंदर की बात सुनती रही, हाँ थोड़ी संजीदा हो गयी थी, वजह...शायद ये थी के आस्था ‘सच’ जानती थी, वो जानती थी कि ये शादी नहीं हो सकती....के दोनों का साथ अब बस कुछ ही दिन का और है...

अक्सर होली में चंदर अपने घर जाया करता था, इस बार भी जा रहा था, “तुम खुद कब सीखोगे अपने सारे सामान ठीक से रखना चंदर?” आस्था बोलते हुए चंदर के सामान पैक कर रही थी, “सुनो अभी ठण्ड पूरी तरह से गयी नहीं...ध्यान रखना ज़्यादा भीगना नहीं...और हाँ भाभी लोगों के साथ होली खेलने कि कोई ज़रुरत नहीं!”

“क्यूँ? जलन होती है?” चंदर बोल पड़ा..

“न, मुझे जलन क्यूँ होने लगी! पर हाँ, कोई तुम्हारी ऊँगली भी छूए, ये मुझे गंवारा नहीं!” आस्था ने हँसते हुए कहा और फिर दोनों हंसने लगे, कुछ देर बाद चंदर चला गया! और आस्था वही खड़े चंदर को जाते हुए देख रही थी, जाने क्यूँ ऐसा लग रहा था जैसे इस बार ये सब अंतिम बार हो रहा है, चंदर के जाने के बाद हर दिन आस्था के लिए एक बोझ सा बन गया,

“आस्था, देख कितने अच्छे अच्छे रिश्ते आ रहे हैं, अब हाँ कह दे बेटी, देख ये लड़का...कितना अच्छा है...सुन्दर भी है, डाक्टर है ये, और सर पर कोई ज़िम्मेदारी भी नहीं, बहुत खुश रखेगा तुझे”!

“मुझे नहीं देखना कोई लड़का, मुझे कहीं नहीं जाना, मुझे तुम्हारे साथ ही रहना है माँ”

“समझती हूँ, पर कबतक? माँ बाप हमेशा तो साथ नहीं रह सकते? ठीक है, तुझे दिवाली तक वक़्त देती हूँ, यदि कोई तेरी नज़र में है तो बता दे, वरना इस लड़के के लिए हम हाँ कह देंगे,

होली गुज़रे दस दिन हो गए, पर चंदर न आया! आस्था अपने घर के बालकनी में दिन भर में अनगिनत बार जाती, और हर बार नाउम्मीद लौटती, चंदर के दरवाज़े पर अब भी ताला लटक रहा था...उसके मन में एक अनजाना डर घर कर गया था! “वो आएगा या नहीं?” चंदर न आया पर उसका एक ख़त आया!

“आस्था, यहाँ मेरे लिए ये लोग लड़की देख रहे हैं, जाने नहीं दे रहे, ऐसा लगता है तुमने मुझे इस बार आने ही क्यूँ दिया? रोक लेना चाहिए था तुम्हे, मेरा दम घुटता है यहाँ, तुम्हे देखे जैसे एक अरसा हो गया, मैं तुम्हारे सिवा किसी और से शादी नहीं कर सकता, मैं शादी नहीं करूँगा कभी भी, मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता, और पापा को तकलीफ भी नहीं दे सकता, वो कहते हैं यदि मैंने तुमसे शादी की, तो वो आत्महत्या कर लेंगे, क्या करूँ आस्था बोलो, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा! ऐसा लगता है जैसे मैं फंस सा गया हूँ...तुम्हारे बिन जीना, मतलब खुद को जीते जी मर देना.. मेरी हर ख़ुशी सीर्फ तुमसे है...पर मैं.........कुछ समझ नहीं पा रहा...प्लीज़ बताओ आस्था क्या करूँ?”

इस ख़त को आस्था ने कई बार पढ़ा, फिर देर रात उसने चाँद शब्द कागज़ पर उतारे....लिखते वक़्त उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे वो खुद को छलनी अपने ही हाथों कर रही है!.........”तुम शादी कर लो” इन शब्दों को कागज़ पर उतारने के बाद, आस्था ने एक गहरी सांस ली...... फिर खुद को समेट... आगे लिखना शुरू किया... “पापा जहाँ कहते हैं वहीँ, उसी लड़की से, अपनी जिम्मेदारियां निभाओ, और कोशिश करना खुश रहने की...हाँ जानती हूँ खुश रहना आसान नहीं, पर मुस्कुराते रहोगे तो ख़ुशी भी आ जाएगी....मेरी चिंता न करना चंदर... मेरे पास बहुत कुछ है...हमदोनो ने मिलकर इतनी यादें बनायी हैं, जिसको याद करते ज़िन्दगी गुज़र जाएगी, और हाँ सुनो...तुम्हे मेरी आँखों में आंसूं कभी नज़र न आयेंगे, मेरे पास मुस्कुराने की तमान वजहें हैं! जो तुमसे मिली हैं...चंदर तुम्हारे एक रिश्ते में मैंने हर रिश्ते को जिया है...कभी महसूस ही नहीं हुआ के तुम मेरे मात्र प्रेमी हो! हाँ तुमने जो रिश्ता बुना वो रिश्ता “परवाह” का रिश्ता था, तुमने मुझे पूरी तरह बदल दिया, और इस बदलाव से मुझे कोई शिकायत नहीं...हर बार तुमने मुझे रास्ता दिखाया, जब जब ज़िन्दगी ने मेरा इम्तिहान लिया, तुमने हाथ पकड़कर मुझे आगे बढ़ना सिखाया, तो क्या हुआ के हम ज़िन्दगी भर साथ नहीं रह सकते? जो यादें हमारी हैं वो तो हमसे कोई नहीं छीन सकता ना? तुम शादी कर लो....जहाँ पापा कहते हैं, वहां! हमारा रिश्ता है और हमेशा रहेगा! क्यूंकि हम दिल से जुड़े...और दिल का जुड़ाव कभी ख़त्म नहीं होता! अपना ख्याल रखना.........सीर्फ तुम्हारी आस्था!  

चंदर का फिर कोई जवाब न आया, आस्था ने बस इतना ही सोचा के वो खुश होगा! अबतक तो उसके बच्चे भी हो गए होंगे, और फिर इतने साल तक कहाँ कोई किसी को याद रखता है!....यही सोचती रही के उस एक फैसले ने चंदर की ज़िन्दगी खुशहाल बना दी होगी! पर आज निशा की बातों ने उसका सारा सुकूं छीन लिया..और वो एक सवाल उसे लगातार परेशां करता रहा...

“क्या वो फैसला सही था”???

2 comments:

  1. वाह!!!!

    प्रेम में फैसले दिल से किये जाते हैं.....
    सही गलत तो दिमाग सोचता है...........

    अनु

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