Wednesday, October 17, 2012

वो कैसा दोष था मेरा जो तुमने दिल मेरा तोड़ा!

के अब मुश्किल होगा तुम्हारे लिए मुझको ढूंढ पाना,
छोड़े जा रही हूँ इस दुनियाँ को तुम्हारी,
वो दुनियां के जिसकी रस्मों के लिए तुमने मुझको छोड़ा था,
उसी दुनियां में तनहा फिरोगे तुम मेरे बगैर,
मुझको याद है तुमने कहा था, मैं रह सकता हूँ यूँ अकेला भी,
पर तुम्हारा साथ होता तो ज़िन्दगी कुछ अलग सी होती,
के तुमबिन यूँ तो जीता आया था मैं कई बरसों से,
मगर अब न मिलोगी तो ज़िन्दगी कुछ खाली सी होगी,
और उसके बाद ही वो एक संदेसा
हाँ वही संदेसा, के जिसको पढ़के तुमने मुझे छोड़ने का निर्णय लिया,
मेरा तुम्हारी ज़िन्दगी में आना भी तुम्हारा निर्णय था,
और तुम्हारा मुझे छोड़ के जाना भी तुम्हारा निर्णय था,
मैं स्तब्ध थी अबतक, हाँ तभी तो उस एक पल में साँसे अटका रखी थी,
पर अब आज़ाद हूँ....
मैं आज़ाद हूँ के आज तुमने ही मुझे मेरा रस्ता दिखाया है,
वही बाहें के जिनको थाम के इस सफ़र को तय करना चाहते थे तुम,
आज उन्ही बाहों को बेआसरा छोड़ तुमने नयी दुनियाँ बसा ली है..
हाँ जानती हूँ तुमने समझौता करना सीखा लिया है,
पर मैंने नहीं,
आजतक न सीख पायी इस छोटे सबक को,
के तुम्हारे बिन भी तुम्हारे साथ होती हूँ,
तुम्हारी याद में हर पल हर दिन मैं रोती हूँ,
न तुम आये न कोई संदेसा ही तुम्हारे नाम का,
के आखिर हार कर मैं खुद तुम्हारे पास आई थी,
और तलाशने की एक नाकाम कोशिश भी की
कि तुम सबकुछ छोड़ कर एक बार फिर वापस तो आओगे,
उन्ही कसमों उन्ही वादों का कुछ तो रस्म निभाओगे,
मगर यहाँ तो ये आलम देखा के आँखें चौंधिया गईं
न तुम आये मुझतक ना तुम्हारी कोई परछाई..
हाँ वो आई थी के जिसको उम्रभर नफरत किया मैंने,
उसी के साथ गुजरी शाम हर आहट पे चौंकती के अब तुम आओगे,
के आखिर जाने के लिए जब मेरे कदम उट्ठे,
वहीँ परदे के पीछे एक साया सा दिखा मुझको,
वो तुम थे....
वो तुम थे हाँ तुम्ही थे तुमको पहचान लिया मैंने,
तुम्हारी एक खुशबु सौंधी सी थी..जान लिया मैंने,
तुम्हे भी इल्म था के ये न जाएगी यहाँ से गर,
न तोडा दिल जो इसका रुसवाई हो जाएगी फिर इधर,
और इसपर सामने पर्दा हटा के वो तेरा आना,
और आके मुझसे ये कहना के जाओ तुम फिर न आना,
तेरे वो लफ्ज़ कानों में मेरे अब भी आवेज़ा है,
मेरी रुखसत का अब है वक़्त, जो मुमकिन हो तो तुम आना,
के बस एक सवाल ही तुमसे हाँ मुझको आज करना है,
वो कैसा दोष था मेरा जो तुमने दिल मेरा तोड़ा!

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