Thursday, October 18, 2012

इश्वर है....यहीं, इसी दुनियां में!

हर बार जब परेशानी आती है तो हम उपरवाले को सवालों के कटघरे में खड़ा कर उस से अपने हालात की वजह पूछते हैं, शिकायत करते हैं और कहते हैं के तू नहीं है इस दुनियाँ में, यदि है तो नज़र क्यूँ नहीं आता, जब सवाल कर रहे होते हैं तो वो करने की आज़ादी हमें सीर्फ इसलिए होती है के वो कोई जवाब नहीं देता! हमारी तरह शब्दों से खेलना उसे नहीं आता, वो सुनता है और मुस्कुराता रहता है, शायद ये सोचकर के जो सामने खड़ा मुझसे सवाल कर रहा है वो कितना मुर्ख है! सच है कोई भी परिस्थिति सदा के लिए नहीं होती, हम नाहक ही घबराते हैं, परिस्थिति का सामना करने और उससे उबरने के बाद भी हमारी सोच हमें यही कहती है के “वो” कहीं नहीं, ये जो कुछ किया ये हमने खुद किया “वो” कहीं मजूद नहीं, पर क्या ये सच है? क्या वो कहीं नहीं? यदि वो न होता तो क्या इन साँसों का आवागमन यूँही चलता रहता?  

“नहीं” ये हमारी कमी है कि हम उसे पहचान नहीं पाते, क्यूंकि वो आभूषण, राजसी वस्त्र, त्रिशूल या गदा के साथ सामने नहीं आता, वो यहीं इसी दुनियाँ में रहता है, किसी साधारण से दिखने वाले इंसान के  अन्दर, हाँ वो इंसान जो हर परिस्थिति में हमारे साथ होता है, वो इंसान जो हमें हमारी परिस्थिति से जूझने में सहायता करता है, जो हमारा आत्मबल बढ़ाता है, वो हर पल साथ न होकर भी साथ होता है,   वो हमारा बांह थामे हमें उस परिस्थिति से बहार निकाल लाता है, वो हमारे आसपास होता है पर नज़रें उसे पहचान नहीं पाती वजह सीर्फ इतनी है के हमें शिकायत करने की आदत है जो नहीं मिला उसके लिए रोने के क्रम में उन तमान खुशियों को नज़र अंदाज़ कर देते हैं!

No comments:

Post a Comment