Friday, October 19, 2012

सांसें अपने बस में कहाँ होती है!

हाँ, मैं यहीं हूँ...
बस तुम्हारा ही इंतज़ार कर रही थी,
तुम आ गये,
मेरा इंतज़ार पूरा हुआ,
अब चलती हूँ,
के ये मेरा इंतज़ार कोई रस्म नहीं,
न कोई रिवाज़ है, बस एक एहसास है,
एक एहसास जो तुम्हारे लिए, हाँ सीर्फ तुम्हारे लिए है..
आज से नहीं ..हमेशा से,
वो एक एहसास के जिसके सहारे मैंने उम्र गुज़ार दी,
वो एक एहसास के जिसके आगे मैंने कुछ भी न देखा,
तुम्हारी हर बात मैंने धर्म की तरह निभाई है,
तुम्हारे इस रिश्ते को मैंने एक पौधे की तरह पाला है,
जिसका बीज तुमने कभी मेरे मन में डाला था,
कुछ अनकही बातें, कुछ अनसुलझे से पल,
कुछ बेरहम फैसले, जिनमें गुज़रा अपना कल,
हाँ वो बस एहसास थे
जिसका होना अब तुम्हारे लिए मायने नहीं रखना,
सो अब चलती हूँ!
के एक और बार तुम जाओगे,
और मैं अपलक तुम्हारा इंतज़ार करुँगी,
ये मुमकिन नहीं.....
सांसें अपने बस में कहाँ होती है!

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