Thursday, October 25, 2012

बस यूँ ही.............

"जानते हो तुम्हारे उस एक ख़त को मैंने कई दफ़े पढ़ा
ये सोचकर के शायद मेरे दिल को जो तुमने चोट पहुचाई है
उसकी ‘आह’ यादों को लग जाए और ये मुझे बक्श दें,
कि शायद वो दर्द मुझमें तुम्हारे लिए कभी न ख़त्म होनेवाली नाराज़गी भर दे,
जिसके सहारे तुम्हे भुलाने की नाकाम कोशिश मेरी कामयाब हो,
ये दिल तो बदनाम था ही कमबख्त यादें भी बेईमान हैं,
देखो न यादों को मेरे दर्द से कोई फर्क नहीं पड़ता,
ऐसा लगता है तुमने अपना हाथ छुड़ा इनके हाथों में मेरी डोर धर दी है
और ये बेशर्म मुझे छोड़ती ही नहीं!"

"वो कहता है,
‘यूँ भी कोई जाता हैं क्या, बगैर इक्तला दिये?
मुझे यकीन है, ये, वही है.........’
वो अब भी उसकी वही पुरानी सी तस्वीर लिए फिरता है,
मैंने कई बार समझाया उसे
कि इस तस्वीर से वो लड़की बिल्कुल मेल नहीं खाती!
वक़्त के थपेड़ों ने उसे बदल दिया,
वो अब हंसती नहीं इस तरह, कि लगे फूल खिलें हो,
उसने खुद को व्यस्त कर लिया है  रोज़ मर्रा के कामों में
न पलकों में अब सपने हैं, न आँखों में मुस्कान ही,
तुम्हारी कल्पना का चाँद अब मुरझा गया हैं,
जाओ कुछ और यादें बनाओ, किसी और को आज़माओ,
उसकी पथराई आँखों में अब कोई चाह नहीं,
कि इस तस्वीर से वो लड़की बिल्कुल मेल नहीं खाती!"

"सुनो, तुम जो जाते हो, तो कह कर जाया करो,
यूँ मुझसे इंतज़ार क्यूँ करवाते हो?
मेरी ख़ामोशी को समझने की कोशिश तो करो,
यूँ शब्दों के जाल फेंकना अच्छा नहीं लगता,
लोगों को कब पता है मेरे दर्द-ए-दिल का सबब,
तुम जानते हो, मुझे दोहराना अच्छा नहीं लगता!"

"मुझसे ख्यालों की महफ़िलें अब और सजतीं नहीं,
तुम्हारा जाना, मेरी हस्ती को वीरां कर गया है!"

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