Friday, October 26, 2012

तन्हाई

अब तो एक अरसा हुआ कि मन को कहीं चैन नहीं, सबसे बातें करना भी एक मजबूरी सा महसूस होता है, कई सारे रिश्तों के बीच भी जैसे अकेलापन है, मन के अन्दर जैसे जाने कितनी बातें चल रही हैं जाने कितने सवाल जिनका जवाब उसे मालूम नहीं!

सुबह से कई बार मोबाईल फोन को देख, सोचती है कि किसी से बात करूँ! माँ से बात करती हूँ, नहीं वो मेरी आवाज़ सुनते ही सवाल करने लगेंगी, कुछ खाया कि नहीं? क्या हुआ आवाज़ उदास क्यूँ है बोल? सवालों से बचने की आदत है उसकी, फिर सोचती है किसी दोस्त से बात कर लूँ! चंद नाम मोबाईल में दीखते हैं, पर किसे दोस्त कहें और किसी सिर्फ पहचान, कुछ तय नहीं कर पाती, कोई ऐसा नहीं जिसे मेरा इंतज़ार हो, ये सोच, मोबाईल फिर से टेबल पर रख देती है.....सोच से बाहर  निकलने की कई तरकीबें सोची, पर सब ने पीछा छुड़ा लिया, दूर दूर तक कोई नहीं, साथ है तो बस तन्हाई, आईने के सामने जाती है और अपने होंठों को जबरन फैलाकर हंसने की कोशिश करती है, देखना चाहती है कि मुस्कुराता चेहरा कैसा दीखता है...एक बार फिर अपने ही फैले होंठ और हँसते हुए आँखों को देखना चाहती है, होंठ मुस्कुराने से इनकार कर देते हैं, आँखों में कोई भाव नहीं, आँखें तो पत्थर सी हो चुकी हैं.....एक गहरी सांस लेती है और अपने बालों का जुड़ा बना रसोईघर में चली जाती है, हाँ अक्सर यही सोचती है के काम में जुट जाऊं तो शायद तन्हाई का एहसास कुछ कम हो जाए, पर ऐसा होता है क्या? उदासी कुछ पल का सफ़र नहीं....बहुत गहरा, बहुत लंबा सफ़र है.....शायद कुछ ऐसा जो कभी ख़त्म नहीं होता!

 

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