Saturday, October 27, 2012

बस यूँ ही...

कल्पना या सत्य? बूझ या अबुझ? अनजान या पहचान? कौन हो तुम? तुम शोर हो या खामोशी, तुम होश हो या बेहोशी, कोई खता हो तुम या नादानी? कौन हो तुम?........

 
“तुम मुझे और अपनी मुस्कान से ठग नहीं सकते,
कि मैं जान गयी हूँ इस मुस्कान के पीछे छिपे षड़यंत्र को,
हाँ वो जो तुमने भेस बना रखा है साधुओं सा,
वो सच नहीं, सिर्फ एक भ्रम है जो तुम लोगों के आँखों में भरते हो,
हाँ मैं जान गयी हूँ के तुम वो नहीं जो प्रत्यक्ष नज़र आते हो,
तुमसे ठगी गयी  हूँ मैं या के अपने भाग्य के हाथों,
नहीं जानती, पर मैं ये जान गयी हूँ के इस मुस्कान के पीछे एक षड़यंत्र है!”

मैंने अक्सर गौर किया है,
कि तुम जब नहीं दीखते
तो मेरे मन के सुर ताल नियंत्रण में रहते हैं,
मेरी आँखें टिकी रहती हैं एक ही दिशा में,
तुमपर एक नज़र पड़ते ही, कुछ हलचल सी मच जाती है,
और मैं सारी दुनिया से बेखबर चल देती हूँ
तुम्हारे पीछे पीछे, एक अज्ञात रास्ते पर
कि जिसपर न मंजिल का पता न सफ़र का,
जानती हूँ तो सिर्फ इतना के तुम हो, मुझसे आगे... रास्ता दिखाते हुए,
जबकि तुम पलटकर एक बार नहीं देखते,
न थामते हो हाथ ही मेरा,
न कहते हो, ‘मुझे तुम्हारी परवाह है’,
न सुनते हो मेरी अनकही बातों को,
न परख पाते हो उन खुशबुओं को जो मुझमें जन्मी थी उस वक़्त कि जब मैंने तुम्हे याद किया था,
कहते हैं एकतरफा प्यार कभी ख़त्म नहीं होता.....
पर किसी ने ये क्यूँ न कहा कि एकतरफा प्यार कभी पूरा नहीं होता!

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