Thursday, October 25, 2012

बस यूँ ही...

"सब तो आते हैं बस तुम ही नहीं आते,
कि जबकि तुम वाकिफ हो इस बात से कि मैं आती हूँ, सीर्फ तुम्हारे लिए,
कि मेरा हर पहर गुजरता है सिर्फ तुम्हारे ही इंतज़ार में,
कि मेरी नज़रें टिकी रहती हैं सिर्फ तुम्हारे एक आहट के लिए,
सब तो आते हैं बस तुम ही नहीं आते,
कि जबकि तुम वाकिफ हो इस बात से कि मैं आती हूँ सीर्फ तुम्हारे लिए,
कि मेरा मन सिर्फ तुमको याद करता है,
कि मेरी धड़कने सिर्फ तुम्हारे लिए मचलती हैं,
कि कोई आए तो लगता है एक बार पूछ लूं तुम्हारा भी हाल,
जान लूं कुछ ऐसी बातें जो तुमने मुझसे न कही,
पर शायद दबी हैं तुम्हारे होंठों में कहीं,
वरना सोचो तो, जो तुम्हारे मन में मेरे लिए प्रेम न होता,
तो क्या मेरा दिल तुम्हारे लिए यों धड़कता?
क्या मेरी नज़रें सिर्फ तुम्हे तलाशती?
सब तो आते हैं बस तुम ही नहीं आते,
कि जबकि तुम वाकिफ हो इस बात से कि मैं आती हूँ, सीर्फ तुम्हारे लिए”

“बस.....और चंद रोज़ देख लो मुझे,
जल्द ही चली जाउंगी यहाँ से,
न ये रास्ते मेरे हैं, न गलियाँ ही,
तुम्हारी गंध थी के खिची चली आई थी,
लेकिन उसपर मेरा हक नहीं, जरा देर से समझी..
मैं जानती हूँ, के मुझे भुलाना तुम्हारे लियी भी आसां न होगा,
इसीलिए कह रही हूँ, और चंद रोज़ देख लो मुझे!
जो इस बार गयी तो लौटना मेरे बस में न होगा!”


हर बार समेटती हूँ अपने वजूद को,
मुझे मुझसे वो दूर करता जा रहा है!”

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