Monday, October 29, 2012

एक अधूरी कहानी!

आरती एक आम लड़की थी, बस एक सीधी साधी सी लड़की, दिन रात अपने काम में व्यस्त रहनेवाली, एक ऐसी लड़की जिसने ज़िन्दगी को जितना सहज बनाने की कोशिश की, जटिलता बढ़ती गयी, वक़्त ने सर से पिता का साया छीन लिया, जिस से बेपनाह मुहब्बत की वो बीच रस्ते में छूट गया, घरवालों ने शादी करवाई, वो भी नाकाम रही....और ज़िन्दगी के पूरे दस बरस उसने तनहा ही काट दिये, दिन रात खुद को व्यस्त रखना ही एक उपाय समझ में आया था, सो किया, गुज़रे सालों में अनगिनत लोग मिले, लेकिन आरती खुद भी समझ न पाती कि वो हर किसी में किसे तलाशती है, मुहब्बत इंसान को कहीं का नहीं छोड़ता, हर चेहरे में एक ही चेहरा तलाशने की आदत सी पड़ जाती है, और जब थोडा नज़दीक से देखो तो वो चेहरा बिल्कुल ही अलग होता है, वो फिर दूर चली जाती और खुद को और भी ज्यादा दुनिया से काट लेती..........वक़्त तो बदला पर आरती नहीं, आरती की अब ये आदत सी हो गयी थी, जब ज्यादा मुस्कुरा लेती तो खुद को सवालों के कटघरे में खड़ा कर पूछती कि क्यूँ हंस रही है? हंसने की ऐसी कौन सी वजह मिल गयी तुझे? तू तन्हाँ है, ये लोग जो मिलते हैं वो बस यूँही मिलते हैं..इनमें से कोई तेरा अपना नहीं, हाँ अपना था वो एक शख्स जो छोड़ गया तुझे बीच मझधार में! कुछ ऐसी ही सोच आरती को फिर से उसी तन्हाई में ला पटकती जहाँ से वो दिन रात भागती फिरती, तन्हाई की शिकार आरती उस शख्स को पसंद करने लगी थी, जिसे वो जानती भी न थी! वो एक लेखक था, अपने एहसासों को शब्दों में पिरो परोसना उसका पेशा था, वो अपनी खामोशी को भी आवाज़ देने का सलीका जनता था, ये हुनर उसे विरासत में मिला था! पर आरती सच से कोसों दूर थी, आरती दिन रात उसकी किताबें पढ़ती, और हर किताब की पात्रा में वो अपनी छवि तलाशती, वो दिशाविहीन मोड़ पर खड़ी थी, उसे खुद भी मालूम न था कि वो खुद के साथ क्या कर रही है! अक्सर उसके हाथ में बस एक किताब होती...वो अपने शब्दों के जाल फेंकता जाता और आरती उस जाल को एक सुनहरा रेशमी दुपट्टा समझ उलझी रहती.....  

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