Wednesday, October 31, 2012

शोहरत

यूँ तो तुम आते नहीं, कुछ कहते या सुनते भी नहीं, पर जाने क्या सूझी तुम्हे कि मेरी कल्पनाओं की सीमा से निकल, कल रात तुम मेरे खाबों में आए, तुम्हे देखा था गली के उसी मोड़ पर, जहाँ देवी का मंदिर है, हाँ उसी देवी का मंदिर जिसकी चौखट पर मैंने कई साल निकाल दिये तुम्हारा इंतज़ार करते! मैंने तुम्हे आवाज़ लगायी पर तुम तक मेरी आवाज़ न पहुची, वो भीड़ थी लोगों की, वो भीड़ के जिसमें मैं किसी को जानती न थी, देखा तुम बहुत बड़े आदमी हो गए हो, लोग तुम्हारे नाम से तुम्हे पहचानने लगे हैं! याद आया के एक वक़्त था उस छोटे से शहर में जब मैं और तुम मूंगफली खाते घंटों निकाल देते, मैं तुमसे हमदोनो के आनेवाले कल की बातें करती, के किस तरह हम अपनी एक छोटी सी दुनिया बसायेंगे, मैं कहती ‘एक दिन हमारा एक छोटा सा घर होगा’ और तुम कहते ‘छोटा घर क्यूँ? बड़ा सा क्यूँ नहीं? मुझे तो बड़ा घर चाहिए, मुझे बहुत आगे निकलना है चाँद, बस एक मौका मिल जाए, फिर देखना सबको छोड़ कितना आगे निकल जाता हूँ!’ और मैं तुम्हे रोक देती बीच में ही! जाने क्यूँ मुझे ऐसा लगता के हमदोनो के सपने कहीं अलग दिशा पकड़ने लगे हैं! मैं डरती थी उस बड़े घर से, के जिसमें दीवारें तो होती हैं, पर लोग साथ रहकर भी अनजान हो जाते हैं! मुझे मेरी ज़िन्दगी में सिर्फ ‘तुम’ चाहिए थे और तुम्हे ‘सबकुछ’!

वो कहते हैं न उपरवाले से मांगो तो वो सुनता ज़रूर है! मैंने तुम्हारी ख़ुशी मांगी थी! मेरी भी सुन ली उसने, तुम्हे खुशियाँ दी, सबकुछ मिला तुम्हे, तुमने वो सब हासिल किया जो तुम चाहते थे, पर जाने क्यूँ आज तुम्हारे चेहरे पर वो मुस्कान नज़र न आई, जो मुझे अक्सर दिखा करती थी! तुम खुश तो हो न??????

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