Tuesday, October 23, 2012

कहो क्या बेहतर है, मेरी सूरत या मेरी सीरत?

कहो क्या बेहतर है,
मेरी सूरत या मेरी सीरत?
वो सूरत जिसपे तुमने पहली ही बार में अपना हक़ समझ लिया था,
वो सूरत जिसे देख तुम हर रिश्ते नाते भूल बैठे थे,
वो सूरत जो वक़्त के साथ धुंधला गया है,
वो सूरत जिसे तुम आज भी देखकर कहते हो,
के “मुझे तो फर्क नज़र नहीं आता”,
वो सूरत जिसे तुम्हारे ही अपनों ने तुम्हारे ही सामने रुसवा किया
वो सूरत जो सीर्फ तुम्हारे लिए बनी थी पर किसी और ने उसे अपना लिया!
कहो क्या बेहतर है,
मेरी सूरत या मेरी सीरत?
वो सीरत, जिसने तुम्हे मुझसे दूर जाने न दिया,
वो सीरत, के जिसको वक़्त के साथ तुमने पहचाना, माना,
वो सीरत, के जिसको देख तुम्हे ये सूरत और भी प्यारी लगी,
वो सीरत, के जिसके आगे तुम्हे कोई मुझ सा नहीं लगता,
वो सीरत के जिसकी परवरिश में मैंने अनगिनत साल खर्चें हैं,
वो सीरत, के जिसमें बस प्रेम बसा है, तुम्हारे लिए,
और तुमसे जुड़े हर किसी के लिए, 
कहो क्या बेहतर है,
मेरी सूरत या मेरी सीरत?

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