Monday, October 29, 2012

याद

अब भी याद है किस तरह हम घरवालों से नज़रें बचा एक दूसरे से इशारों में बातें करते थे, कभी बात बात में तुम कुछ ऐसी बात कह जाते जिसे सुन मेरे चेहरे पर अनायास ही मुस्कान बिखर जाती, नज़रें झुक जाती, कभी यूँ भी हुआ के किस्मत से कुछ लम्हे मिले जब हम तुम और कोई नहीं.... मैंने दो प्याली चाय बनायी, और गर्म चाय ठन्डे हो गए, दोनों को होश ही न था, तुम तुम्हारी नज्में सुनाते और मैं अपलक तुम्हे निहारती रहती, जितनी सुन्दर आँखें, उतनी सुन्दर सोच, तुम्हे सुनना पसंद था मुझे, आज भी है...

वक़्त और किस्मत ने दोनों को एक ही छत के नीचे रख छोड़ा, और अब कोई नहीं होता....पर तुम भी नहीं होते!

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