Wednesday, October 10, 2012

ख़ाब

शायद उसकी बातों में कुछ तुझ सी महक पाती हूँ,
तभी तो आँखें मूंदें बस सुनती रहती हूँ उसको!

जानते हो, कई रातों से बस एक ही ख़ाब  मेरी आँखों में तैरते फिरते हैं तुम आते हो, मेरी ओर देखते हो, मुस्कुराते हो, मेरी हथेली अपनी हथेली में लेकर कुछ देखते हो, और फिर जब मैं तुमसे पूछती हूँ 'तुम्हारा नाम लिखा है मेरी हथेली पर, देखा तुमने? तो तुम बगैर कुछ कहे चले जाते हो, मैं तुम्हारे पीछे भागती हूँ पर तुम मेरी आँखों से ओझल हो जाते हो! घबराहट में मेरी आँखें खुल जाती हैं, ख़ाब  टूट जाते हैं, खुद को एक और बार तन्हा  पाती हूँ!

सुबह भी दर्द का पयाम लिए आती है,
रात भी चैन-ओ-करार लिए जाती है!

2 comments:

  1. जिंदगी भी एक ख़्वाब ही तो है, जिसका टूटना निश्चित है. फिर भी हम ख़्वाब देखे चले जाते हैं.

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