Thursday, October 4, 2012

बस यूँ ही......

"बस यूँही गुजरते जाएँगे ये दिन और रात,
न कुछ बोलेंगे, न कुछ सुनेंगे,
बस गुजरते जाएँगे,
कुछ हमारी तरह, कुछ तुम्हारी तरह…
गुज़रे हम तुम.. के वक़्त गुज़रा…मालूम नहीं
गुजरी नहीं तो बस एक खामोशी,
वो एक ख़ामोशी जो अब महज़ ख़ामोशी नही
सन्नाटा बन चुकी है!
'सन्नाटा' जो डराता है मुझे हर रोज़ हर पल,
वो डर मुझे मुझसे दूर करता है...
और तब मैं गुज़रे लम्हों को सहेजकर अपने सिरहाने ले आती हूँ..
तुम्हारा मुस्कुराता चेहरा...वो अनकही बातें..
ऐसा लगता है जैसे अभी अभी तुमने नज़रों से कुछ कहा..
जिसे सीर्फ तुमने कहा...और मैंने समझा..
एक और बार मेरे बिखरे वजूद को तुम जोड़ जाते हो!"

No comments:

Post a Comment