Monday, October 15, 2012

सुबह सुबह एक ख़ाब की आहट

सुबह सुबह एक ख़ाब की आहट ने नींद से जगाया, जब आँखें बंद थी मैंने देखा तुम आए हो, हाँ बिलकुल उसी तरह जैसे अक्सर तुम आया करते थे..आहट धीमी किये, हौले से दरवाज़े से पर्दा हटा तुम सीधे किचेन में आ जाते और पीछे से मेरी आँखें बंदकर हौले से कानो में कुछ कहते, तुम्हारी बात सुन मेरे चेहरे पे मुस्कान बिखर जाती और तुम कहते...बस इस एक मुस्कान के लिए तो मेरी जान भी हाज़िर है!

गुजरते वक़्त के साथ बहुत कुछ बदल गया था हमारे बीच, पर एक चीज़ तुमने अब भी रखी थी, जाने ग़लती से तुम्हारे पास रह गयी या तुमने संभालकर रखा, वो शर्ट, हाँ वही शर्ट जो मैंने शादी के बाद के पहले जन्मदिन पर दिया था, वो धारी वाली नीली शर्ट, मुझे अब भी याद है उस रोज़ तुम्हारे जन्मदिन के ठीक एक रोज़ पहले ऑफिस से मैं जल्दी निकलना चाहती थी पर निकलते वक़्त ही कुछ काम आ गया और थोड़ी देर हो गयी, मेरी कलिग ने कहा, “कल ले लेना अभी वैसे ही देर हो गयी है”, पर मैंने कहा, “नहीं कल उनका सबसे ख़ास दिन है और उनके दिन की शुरुवात मैं आज की चांदनी रात में उनके चेहरे पर मुकान बिखेर कर करना चाहती हूँ”, मैं उसी वक़्त निकली और लाजपत नगर पहुची, किस्मत धोका देने से बाज कब आती है, सारे दूकान बंद हो चुके थे, बस एक दूकान की शटर गिरने को ही थी कि मैं पहुच गयी और शर्ट दिखाने को कहा, उसने कहा,
“साइज़ बताइए”,

“साइज़ तो मालूम नहीं पर वो छः फिट के हैं, ना मोटे ना दुबले, सांवला सा चेहरा और बड़ी बड़ी आँखें, उनको हंसने के लिए होंठ का इस्तेमाल नहीं करना पड़ता, आँखें मुस्कुराती हैं उनकी, उनकी भंवे, उनके होंठ, उनकी आँखें सब ऐसी..जैसे उपरवाले ने फुर्सत के लम्हें में बनाया हो, हालाँकि वो चित्रकार नहीं हैं, पर उनके हाथों कि उंगलियाँ वो कहते हैं न ‘आर्टिस्टिक उंगलियाँ’ हाँ बिल्क्कुल वैसी हैं, और उनके पैर..........”

“मैडम समझ गया आपके पति इस दुनियाँ के सबसे खूबसूरत शख्स हैं पर मैंने आपसे उनके शर्ट का नाप पूछा था, खैर बद्तीस (३२) आएगा उनको! हम्म कौन से रंग की देखेंगी?”

“नीले रंग की धारियों वाली शर्ट दिखाओ!”
तुम्हारे लिए कुछ लेना आसान भी कहाँ था, तुम्हे तो कुछ भी पसंद नहीं आता था, थोड़ा ज़्यादा वक़्त लग गया, पर बहुत खुश थी उस पल को सोचकर जब तुम्हे दूंगी और तुम्हारे चेहरे पर आई ख़ुशी की वजह मैं होऊंगी, अरसा गुज़र गया जब तुम मेरे सामने दो पल बैठकर बात करते, मुस्कुराते! तुमने खुद को काम में पूरी तरह व्यस्त कर लिया था, कभी कभी लगता जैसे ये शादी तुम्हारे लिए कुछ नहीं बस बोझ बन गयी है,  आमतौर पर तुम घर देर से आते पर उस रोज़ जब घर पहुची तो तुम आ चुके थे,

“कहाँ घुमती रहती हो? मेरे पीछे तो तुम रोज़ इसी तरह आती होगी? सोचती होगी कोई पूछनेवाला तो है नहीं, पैर टिकते नहीं तुम्हारे घर में, आवारगी के लक्षण हैं ये”
तुम बस बोलते गए जैसे तीर छोड़ रहे हो, वो तीर मुझे भेद रहे थे, और मेरी आँखें अपनी कहानी कहती रही, जिसे सुनने भर की फुर्सत न थी तुम्हारे पास....हाँ मेरे चेहरे की तरफ देखने के लिए तुम्हारे पास कुछ पल कहाँ थे! मैंने वार्डरोब में तुम्हारे ख़ाके में शर्ट रख दिया, हाँ रात को देने का हौसला जुटाना मुश्किल रहा! मैं अकेली आराम कुर्सी पर बैठे समंदर की लहरों को देखती रही, जैसे उनकी उस शोर में मैं सबकुछ भूल जाना चाहती हूँ! जैसे मैं इस समंदर में डूबकर देखना चाहती हूँ के क्या इस शरीर के ख़त्म होने से मन को सुकूं मिलता है! क्या मेरे चले जाने से तुम मुस्कुराओगे? साड़ी रात यूँही कट गयी और सुबह आँख कब लगी कुछ याद नहीं, तुम्हे मालूम भी न चला के मैं कमरे में आई भी नहीं! अगली सुबह तुमने देखते ही कहा,

“ये नीला शर्ट? तुम्हे मालूम नहीं मुझे नीला रंग बिलकुल पसंद नहीं? प्लीज़ मेरे लिए कुछ मत लाया करो, मुझे तुम्हारी पसंद..पसंद नहीं!”

मैं चुप थी, मन की आवाजें गूंज रही थी मेरे कानो में, पर उनको शब्द का रूप देने की हालत न थी मेरी बस एक सवाल करना चाहती थी तुमसे के मेरी पसंद तो तुम थे..क्या तुम खुद को पसंद नहीं करते? आह नहीं तुम तो मुझे पसंद नहीं करते, इस शादी में प्यार कभी दोतरफा हुआ ही नहीं, तुम्हारी पसंद की लड़की मुझ सी तो हो ही नहीं सकती, हाँ ये तुमने मुझसे कहा नहीं, लेकिन तुम्हारे बदलते स्वाभाव ने बहुत कुछ समझाया है, पर वो भी तो तुम ही थे न जिसने उस छोटे से शहर में मेरी आँखों में ख़ाब छोड़े थे, ऐसे ख़ाब जिनकी दली पकडे मैं बरसों तुम्हारा इंतज़ार करती रही, तुम आये भी शादी भी की, पर शायद सीर्फ रस्म निभाने के लिए!

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