Thursday, October 18, 2012

तुम्हारी ख़ामोशी.........

हाँ ऐसी बहुत सी कविताएँ अधूरी छोड़ रखी हैं मैंने,
कि जिनके पूरे होने कि कोई गुंजाइश नहीं,
वो कहते हैं न बातें अधूरी हो, तो कहानी पूरी कैसे हो,
मैंने तुमसे कहा, हाँ कई बार कहा, पर
तुम चुप थे, सुनते रहे,
और आखिर अपनी बेड़ियों को तोड़ पाना तुम्हे नामुमकिन लगा,
हाँ एक बार नज़रें उठाई थी तुमने, कुछ इस तरह,
कि बहुत कुछ है जो तुम कहना चाहते हो,
जैसे एक पूरी ज़िन्दगी पड़ी है, जो जीना चाहते हो,
जैसे किसी पहाड़ के सबसे उपरी सतह पर जाकर मेरा नाम पुकारना चाहते हो,
जैसे इन नियमों, कानूनों से दूर, मेरा हाथ पकड़ मुझे ले जाना चाहते हो,
जैसे एक और बार मेरी आखों में अपने सपने सजाना चाहते हो,
पर तुम खामोश रहे,
चलते वक़्त पलटकर भी न देखा,
याद है एक बार तुमने
तुम्हारी वो तस्वीर लगायी थी,
और लगाते वक़्त कहा था, “देखो, इसे यहाँ से कभी हटाना नहीं,
तुम्हे मुझे तलाशने की कभी ज़रुरत न पड़ेगी,
मैं यहीं हूँ, यहीं रहूँगा....तुम्हारी नज़रों के सामने....
तुम्हारी तस्वीर थोड़ी तिरछी हो गयी है,
एक बार आ जाओ इसे ठीक कर चले जाना!”

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