Monday, October 8, 2012

पथराई आँखें

जाने दो आँखें मुझमें क्या तलाशती हैं,
कभी दिल में धड़कन,
कभी नज़रों में जुनूं तलाशती हैं,
कभी साँसों में थिरकन,
और ज़हन में ख़ुशी तलाशती हैं,
कोई बताए इन्हें के वक़्त के थपेड़ों ने,
न आँख में काजल छोड़ा ,
न हाथ में मेहंदी ही,
न पलकों में ख़ाब छोड़ा,
न लबों पे तिशनगी ही,
ग़मों की आंधी जब चली,
उड़ा के ख़ाब ले चली,
न कोई अरमान है,
न कोई जुनूं
ना कोई ख़ुशी है
और न सुकूं!"
बस एक इंतज़ार है शायद,
पथराई आँखों में!
 
 

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