Saturday, October 13, 2012

क्या एहसासों को उम्र का दलील देना ठीक है

दीदी के नाम अक्सर तुम्हारे ख़त आया करते थे और उस लिफ़ाफ़े में मैं अपने नाम का ख़त ढूंढती, पर वो न मिलता...और जब दीदी पढ़ने लगती तो मैं उसके पास खड़ी हो जाती और कहती बोल के पढ़ो..मुझे भी सुनना है, मेरी जिद्द पे वो पढ़ के सुनाती और मैं ख़त के पूरे होने तक ये ढूंढती के तुमने मेरे लिए कुछ भी लिखा है या नहीं! कितनी नादान थी कि जबकि मैं ये जानती थी कि तुम दीदी के बचपन के दोस्त हो, मेरा होना या ना होना तुम्हारे लिए ज़्यादा मायने नहीं रखता, फिर भी एक हक समझने लगी थी, अनजाना हक... वो हक जिसका अर्थ उस वक़्त खुद भी मालूम न था, तुम दिल्ली में और मैं हज़ार किलोमीटर दूर, फिर भी कुछ था जो बांधे रखा था मुझे तुमसे, उम्र कुछ भी न थी मेरी उस वक़्त.. लेकिन इतना ज़रूर याद है कि पहली बार जब इस एहसास ने जन्म लिया, तब इन आँखों में चेहरा सीर्फ तुम्हारा था! मुझे अब भी याद है जब मैंने तुम्हे शिकायती ख़त भेजा था, तो अगले ख़त में मेरे लिए भी दो लाइने लिख के भेजा था तुमने, ”तुम रूठी रहो मैं मनाता रहूँ, के इन अदाओं पे और प्यार आता है” दीदी उस ख़त को पढ़कर बस हंसती रही, और माँ से कहने लगी, “देखो माँ इस लड़की को, वो बेचारा उतनी दूर पढ़ाई करने गया है और ये यहाँ से शिकायती ख़त लिखती है उसे.....सब मज़ाक कर रहे थे, पर मेरा चेहरा लाल हो रहा था, थोड़ा शर्म से...और थोडा ये सोचकर के क्या तुम मेरे एहसास को समझते भी नहीं? क्या ये एहसासात बस एकतरफ़ा हैं?

उन दिनों कुछ ऐसे ही दिन थे, शाम जैसे एक सिन्दूरी रंग इख़्तियार करती और सुबह अपनी लालिमा बिखेरा करती थी...हर रंग उनदिनों ख़ूबसूरत लगता था..

“सार्थक आने वाला है चाँद”

दीदी कि ये बात सुनते ही जैसे मुझे पंख लग गए, अपने वार्डरोब में से नीले रंग के सारे शलवार कमीज़ निकाले, पर निर्णय करना मुश्किल हो रहा था, दीदी ने पूछा

”तू किस बात कि तयारी कर रही है” मैंने कहा,”कुछ नहीं दी बस यूँही...." दीदी मुस्कुराते हुए कुछ कहते हुए “हाँ सब समझती हूँ मैं” वहां से चली गयी! हमदोनो अक्सर देर शाम तक छत पर टहला करते थे, दीदी ने अचानक ही कहा

“तेरह तारीख को आ रहा है वो! हाँ जानती हूँ, तेरे जन्मदिन के दिन आ रहा है, पर उसे याद नहीं!
“उसे याद नहीं?” मैंने पूछा..........
“चाँद, मैंने तुझे एक बात नहीं बतायी.. जानती है उस रोज़ उस ख़त में एक और बात लिखी थी”  
“क्या दीदी?” 
“हम्म.. एक लड़की है, सार्थक के घर के सामने ही रहती है वहां दिल्ली में, वो उसे पसंद करता है! और अक्सर चिट्ठी में उसका ज़िक्र भी करता है, कहता है......घने काले लम्बे केश हैं उसके, होठों के ऊपर एक काला  तिल है, और पढ़ने लिखने में बहोत तेज़ है, काफी अच्छी मच्योरिटी कि बातें करती है.... हाँ अक्सर गुरूद्वारे जाती है, तभी दिखती है उसे.....वैसे अबतक बात नहीं कि उसने पर जल्द ही करेगा.....देख चाँद तू उसके बारे में सोचना छोड़ दे! उसकी पसंद तू कभी हो ही नहीं सकती, तुझे तो बच्ची समझता है, हालाँकि...................”
“पर मैं बच्ची नहीं दीदी”
“हाँ जानती हूँ, लेकिन तुझे मच्च्योर होने में अभी वक़्त है”
“मच्योरिटी किसी कहते हैं दीदी?, तुम्हे क्या लगता है, क्या उसने मेरी आँखों में कभी कुछ भी नहीं पढ़ा होगा? जिस एहसास को तुम समझ गयी, क्या उसकी समझ में कुछ भी न आया होगा?, मुमकिन है मेरी उम्र कम है अभी, पर क्या उम्र एहसासों पर ताला लगा सकते हैं?”

हमारी बात फिर इस मसले पर न हुई, हाँ दीदी कि शादी कि शाम उसने कहा, अब बस कर,....कबतक इंतज़ार करेगी?”

मैं चुप थी............

दीदी कि शादी हुए दस साल हो गए, मैं अब भी सार्थक का इंतज़ार कर रही हूँ! उम्र का फासला तो तय कर लिया......पर एहसास तो अब भी वही हैं!....................

क्या एहसासों को उम्र का दलील देना ठीक है,
क्या रिवाजों को एक बहाना बनाके चलना ठीक है!  

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