Friday, November 2, 2012

बस यूँ ही......

'मुझे नफरत थी;
झूठ से,
नशे से,
बेईमानी से और
क्रोध से
मुझे प्रेम था;
सत्य से,
इमानदारी से,
समर्पण से,
तुमपर हर बार यकीन किया, खुद से झूठ बोला, खुद को छला, सत्य से दूर हुई  
तुम्हारी इस कदर आदत डाल ली के तुम्हारे बगैर जीना बेमाने हो गया, कुछ कुछ तुम्हारा नशा सा,
तुम्हे जानने के बावजूद तुम्हारा इंतजार किया, खुद से बेईमानी की,
और जब कुछ न मिला तो खाली हाथ मलते खुद को देखा, खुद पर क्रोध आया!'

'तुम घिरे हो असंख्य कलियों से,
तुम्हे छू पाने की उम्मीद कुछ चाँद को तोड़ने जैसा,
तुम्हारा घर जैसे मधुबन,
और तुम हो एक सुन्दर फूल जिसकी खुशबू बसा ली है मैंने खुद में,
मेरी मृत्यु निश्चित है तुम्हारी भुजाओं में!'

'मेरे मन मेँ वो बात जो छुपी है सदियोँ सेँ, आज कह दूँ गर इजाजत दो। बात बस इतनी सी है के साथ होता जो तुम्हारा....मैँ इतनी अधूरी न होती........'

'ऐ सूरज तू कबतक अपनी किरणोँ से मुझे जलाता रहेगा, चाँद की आगोश से बार बार मुझे खीच के लाना बँद कर, सो जाने दे एक बार मुझे हमेशा के लिये.........'

'जाने क्यूँ दिल.. रस्मों रिवाजों को मानता नहीं,
जाने क्यूँ दिल.. दुनिया, इन समाजों को मानता नहीं,
जाने क्यूँ दिल.. तेरी राह तकता है आज भी,
जाने क्यूँ दिल.. अपनी रुसवाई को स्वीकारता नहीं!'
 


 

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