Tuesday, November 20, 2012

बस यूँ ही..

ये कैसी तन्हाई काले साए के मानिंद छाई है मुझपर,
के उदासी दिल से शुरू हो अब चेहरे तक पहोच आई है,
ये चाँद एक दिन छुपता है,
तो इस आसमान को अकेलापन काटने को दौड़ता है,
और हर कोई जुट जाता है,
उसके उस अंधकार को उजाले में तब्दील करने के लिए,
पर मेरी ज़िन्दगी का अमावास कब छटेगा,
आखिर क्या है जिसका इंतज़ार ख़त्म ही नहीं होता,
खुद से सवाल कर कर के अब थक गयी हूँ,
मैं, अब मेरे दिल से घबराने लगी हूँ,
जाने कैसी जिद्द किये बैठा है,
के मुझको एक पल सुकून का ये बक्श्ता नहीं,
इसे देखते ही डर जाती हूँ,
के फिर वही उदासी की पोटली लिए आता होगा,
फिर उन्ही राहों से गुजारेगा मुझको,
फिर नज़रें धुंधलाएंगी आंसुओं से मेरी,
फिर वीरान कर के जाएगा मेरी हस्ती को............. 

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