Thursday, November 22, 2012

बस यूँ ही.......

'हाँ ये मेरी आदत है,
के मैं सच से अपनी आँखें मूँद लेती हूँ,
कोई जब कहता है, के तुम खुद को धोका दे रही हो,
तो सर घुमा लेती हूँ, और सोचती हूँ के कुछ सुना ही नहीं,
मुझे प्रिय है तुम्हारी यादों में रहना,
तुम्हे सोचना,
‘सच’ की हर बूँद से नफरत है मुझे,
यूँ लगता है कभी कभी
के ज़िन्दगी एक मिली थी वो तो मैं जी चुकी,
अब क्या कर रही हूँ इस दुनिया में...'

'के नकली मुस्कान होठों पर पहने,
समाज के बनाए रिश्ते की लाश काँधे पर उठाए फिरती हूँ!
शायद एक इंतज़ार अब भी मेरे अन्दर बसता है..........'

'उसकी हिकारत भरी नज़रें भी देखी हैं,
के जिसको उम्र भर मैंने खुदा समझा है……'
 

'आज अफ़सोस नहीं मुझको तेरे जाने का,
तेरे होने से भी मेरी ज़िन्दगी बदलती नहीं,
मेरी तकदीर, मेरे बस में कहाँ थी जाना............'
 

 

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