Saturday, November 24, 2012

बस यूँ ही............

'किसी को परवाह नहीं तुम्हारे सिवा मेरी,
बस एक तुम ही हो जो मुझपर नज़र रखते हो,
के जब भी उठकर जरा चलने की कोशिश करती हूँ,
फिर से एक और चोट मुझको रसीद करते हो....'
 

'ये कैसा उम्मीद का दामन थमाते हो हर बार और फ़िर खेँच लेते हो अचानक ही, रह जाती हूँ मैँ निश्प्राण सी, जबकि मैँ किसी मासूम बच्चे की तरह करती हूँ यकीन तुमपर हर बार और तुम?'

'बाहर शहनाई बज रही है जिसके गूंजने की आवाज़ आ रही है, छोटी उम्र की लड़कियां छेड़ रही हैँ दुल्हन को, जिसने ज़ेवर के साथ शर्म भी पहन रखा है, उसकी आँखोँ मेँ उम्मीद है, और अनगिनत ख़ाब हैँ, ज़रा सा ग़म भी है अपनोँ से बिछड़ने का और थोड़ी घबराहट भी । इन सारे अहसासोँ मेँ मात्र घबराहट ही स ही है बाकी बेमाने'

'उसके हाथ में अक्सर एक पत्थर पाया गया है,
हाँ मेरे नाम का पत्थर,
मुझे बताया था किसी ने,
वो जब भी कुछ लिखता है,
मेरा ज़िक्र ज़रूर करता है,
रंजिश निकालने के लिए उसने कलम का सहारा लिया है,
एक अरसे पहले कहा था मुझसे,
अब तुम्हे भुला दूंगा,
के तुम मेरे लिए मायने नहीं रखती,
तुम हो के नहीं इस से मुझे फर्क नहीं पड़ता,
क्या वाकई उसने भुला दिया मुझे?'


'

 

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