Thursday, November 22, 2012

बस यूँ ही.......

'नहीं मुझे तुमसे प्रेम नहीं
जो है, वो स्वार्थ मात्र था,
स्वार्थ, के तुम्हे देख सकूँ एक पूरी उम्र भर के लिए,
स्वार्थ, के भुला दूँ खुदको और हो जाऊं तुम्हारी सदा के लिए,
स्वार्थ, के तुम्हारी एक सांस की खातिर गर देनी परे जान भी तो उफ़ न करूँ,
नहीं मुझे तुमसे प्रेम नहीं
जो है, वो स्वार्थ मात्र था!'
 

'मैंने अपना सारा सामान बाँध लिया है,
तुम्हारी यादें, तुम्हारे खाब, वो सारे पल और हाँ कुछ लफ्ज़ भी तो हैं..
सबको संभाल के एक पोटली में बाँध लिया है,
के इस बार जब तुम आओगे, तो न बोलूंगी के ‘कुछ पल रुको’,
के न दूंगी तुम्हे मौका छोड़ कर के जाने का,
मेरे सामान मेरे साथ लिए, निकल पडूँगी
तुम्हारा हाथ थामे
उसी रास्ते पर के जिसकी मंजिल तुम थे तुम हो.........'


'हर नाकामयाब तजुर्बा एक नए नज़रिए को जन्म देता है.......'
 

'बदली हुई हकीक़त गुज़रा हुआ ज़माना,
 है याद आज भी वो मेरा तेरा फ़साना..........'


'कल चक्खा था तुम्हारे लफ़्ज़ों को,
थोड़े फीके से लगे मुझको,
तुम्हारी खुशबू अब और इनसे नहीं आती!'
 




 

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